झारखण्ड

VictimRights – यौन अपराध पीड़ितों की सुरक्षा को लेकर सख्त हुआ हाई कोर्ट

VictimRights – झारखंड हाई कोर्ट ने यौन अपराधों से प्रभावित महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि ऐसे मामलों में पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन को तय नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। न्यायालय ने जांच प्रक्रिया में तेजी लाने, पीड़ितों की गोपनीयता बनाए रखने और पुनर्वास सुविधाओं को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया है।

high court victim protection guidelines

मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनाक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने एक जनहित मामले की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्धारित नियमों का पालन न करने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

शिकायत मिलते ही दर्ज होगी Zero FIR

अदालत ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया है कि यौन अपराध की सूचना मिलते ही तत्काल Zero FIR दर्ज की जाए। न्यायालय ने कहा कि घटना किसी भी क्षेत्राधिकार में हुई हो, शिकायत दर्ज करने में देरी नहीं होनी चाहिए।

कोर्ट का मानना है कि शुरुआती स्तर पर देरी होने से जांच प्रभावित हो सकती है और पीड़ित को अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए पुलिस को संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

जांच और सुनवाई के लिए तय की समयसीमा

हाई कोर्ट ने ऐसे मामलों की जांच को समयबद्ध बनाने पर भी जोर दिया है। अदालत ने कहा कि प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए, जबकि संपूर्ण जांच दो महीने के अंदर समाप्त होनी चाहिए।

इसके साथ ही न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट को भी निर्देश दिया कि आरोपपत्र दाखिल होने के बाद मामलों की सुनवाई निर्धारित कानूनी समयसीमा के भीतर पूरी की जाए। अदालत ने अनावश्यक स्थगन से बचने की आवश्यकता बताई ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।

विवादित मेडिकल परीक्षण पर दोहराई रोक

न्यायालय ने चिकित्सा संस्थानों में विवादित टू-फिंगर टेस्ट पर पूर्ण प्रतिबंध की बात दोहराई है। अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया वैज्ञानिक आधार पर उचित नहीं मानी जाती और इससे पीड़िता की गरिमा प्रभावित होती है।

राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि सभी सरकारी और निजी स्वास्थ्य संस्थानों को इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। आदेश का उल्लंघन करने वाले चिकित्सकों के खिलाफ आवश्यक अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

बच्चों की शिक्षा के लिए विशेष व्यवस्था

अदालत ने उन बच्चों के हितों को भी ध्यान में रखा है जो यौन अपराधों से जुड़े मामलों के परिणामस्वरूप जन्मे हैं। न्यायालय ने राज्य सरकार से ऐसे बच्चों की 12वीं कक्षा तक निशुल्क शिक्षा सुनिश्चित करने को कहा है।

इसके लिए जिला स्तर पर नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही उच्च शिक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति और अन्य शैक्षणिक सहायता उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया है।

वन-स्टॉप सेंटरों की सुविधाएं सुधारने के निर्देश

हाई कोर्ट ने राज्य के कई वन-स्टॉप सेंटरों की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा कि इन केंद्रों में बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाना आवश्यक है ताकि पीड़ितों को सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण मिल सके।

न्यायालय ने खाली पदों को भरने, परिसर में निगरानी व्यवस्था मजबूत करने, स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने और अन्य आवश्यक सुविधाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। अदालत का मानना है कि ये केंद्र पीड़ितों को सहायता और पुनर्वास प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मुआवजा और गोपनीयता पर भी जोर

कोर्ट ने कहा कि पीड़ितों को स्वीकृत अंतरिम मुआवजा निर्धारित अवधि के भीतर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। आदेश के अनुसार, पात्र मामलों में भुगतान 30 दिनों के अंदर सुनिश्चित किया जाए।

इसके अलावा अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि किसी भी परिस्थिति में पीड़ितों की पहचान सार्वजनिक न होने पाए। न्यायालय ने गोपनीयता को पीड़ित संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए इस संबंध में पूरी सावधानी बरतने को कहा है।

Back to top button

Adblock Detected

Please remove AdBlocker first, and then watch everything easily.