Defection Politics – बागी सांसदों के नए कदम से बढ़ी तृणमूल की चुनौती
Defection Politics – पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी असंतोष अब एक नए मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। पार्टी से अलग हुए सांसदों के समूह ने रविवार को अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर बड़ा फैसला लेते हुए त्रिपुरा की एक क्षेत्रीय पार्टी के साथ विलय की घोषणा की। साथ ही इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर सदन में अलग समूह के रूप में मान्यता और बैठने की अलग व्यवस्था की मांग भी रखी है।

बागी खेमे को मिला वरिष्ठ नेता का साथ
तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लंबे समय तक पार्टी का संसदीय चेहरा रहे सुदीप बंदोपाध्याय भी अब खुले तौर पर बागी गुट के साथ नजर आ रहे हैं। उनके इस कदम को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि वे कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सबसे करीबी नेताओं में गिने जाते थे। बागी समूह में शामिल होने के बाद उन्होंने संकेत दिया कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था केवल अंतरिम कदम है और आगे की रणनीति जल्द सार्वजनिक की जाएगी।
पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा करने की तैयारी
मीडिया से बातचीत के दौरान सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा कि दो-तिहाई सांसदों के समर्थन के साथ अलग होने वाले समूह को कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। उन्होंने बताया कि अगले महीने चुनाव आयोग और न्यायिक मंचों के समक्ष यह दावा पेश किया जा सकता है कि वास्तविक तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व वही समूह करता है, जिसके पास सांसदों का बहुमत है। अंतिम निर्णय संबंधित संवैधानिक संस्थाओं द्वारा लिया जाएगा।
लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा गया आवेदन
बागी सांसदों की ओर से काकोली घोष दस्तीदार ने बताया कि कुल 20 सांसदों ने एक संयुक्त आवेदन पर हस्ताक्षर किए हैं। यह आवेदन लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा गया है, जिसमें अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया गया है। उनके अनुसार, सांसदों का यह समूह आगे चलकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय करेगा और केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार को समर्थन देगा।
कौन है NCPI?
नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया त्रिपुरा में पंजीकृत एक राजनीतिक दल है। राज्य की राजनीति में इसकी मौजूदगी सीमित मानी जाती है। वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कुछ सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली थी। इसके बावजूद हालिया घटनाक्रम के बाद यह पार्टी अचानक राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन गई है।
NDA की संख्या पर पड़ सकता है असर
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर अब इस बात पर है कि यदि बागी सांसदों का समूह औपचारिक रूप से NDA का समर्थन करता है, तो लोकसभा में गठबंधन की संख्या और मजबूत हो सकती है। वर्तमान में भाजपा को कई सहयोगी दलों का समर्थन प्राप्त है, जिनमें तेलुगु देशम पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) प्रमुख हैं। ऐसे में 20 से अधिक सांसदों के संभावित समर्थन से गठबंधन की संसदीय ताकत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है।
तृणमूल के सामने बढ़ी संगठनात्मक चुनौती
तृणमूल कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति और वरिष्ठ नेताओं का अलग रुख नेतृत्व के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है। आने वाले हफ्तों में चुनाव आयोग, संसद और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े कदम इस पूरे मामले की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।