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ClassicCinema – चार दशक बाद भी दर्शकों के दिलों में जिंदा यह लोरी

ClassicCinema – हिंदी सिनेमा में कुछ गीत ऐसे होते हैं जो समय की सीमाओं से परे जाकर पीढ़ियों तक लोगों के दिलों में बसे रहते हैं। वर्ष 1985 में रिलीज हुई फिल्म ‘संजोग’ का एक ऐसा ही गीत है, जिसने मां और बच्चे के रिश्ते की भावनाओं को बेहद मार्मिक अंदाज में पर्दे पर उतारा। जया प्रदा और जीतेंद्र अभिनीत इस फिल्म की कहानी जितनी भावुक थी, उसके गीतों ने भी दर्शकों पर उतना ही गहरा प्रभाव छोड़ा। खासकर “यशोदा का नंदलाला” आज भी उन चुनिंदा गीतों में शामिल है, जिन्हें सुनते ही ममता और बिछड़न की भावनाएं एक साथ उभर आती हैं।

sanjog lullaby loved after decades

मां के दर्द को छूती थी फिल्म की कहानी

फिल्म ‘संजोग’ की कहानी एक ऐसी मां के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने बेटे को एक हादसे में खो देती है। इस सदमे को वह स्वीकार नहीं कर पाती और अपने बच्चे की यादों में ही जीती रहती है। जया प्रदा ने फिल्म में दोहरी भूमिका निभाई थी और उनके अभिनय को दर्शकों ने खूब सराहा था।

कहानी का भावनात्मक पक्ष उस समय और गहरा हो जाता है, जब उनका किरदार एक गुड्डे को अपने बेटे की तरह मानकर उससे बातें करता है, उसे प्यार करता है और उसके साथ समय बिताता है। इस स्थिति ने फिल्म को सिर्फ एक पारिवारिक कहानी नहीं रहने दिया, बल्कि इसे मातृत्व की संवेदनाओं से जुड़ी यादगार प्रस्तुति बना दिया।

एक गीत जिसने भावनाओं को दी आवाज

फिल्म का सबसे चर्चित गीत “यशोदा का नंदलाला, ब्रज का उजाला है” उस दौर में ही नहीं बल्कि आज भी लोगों की पसंद बना हुआ है। यह गीत फिल्म के उस भावुक हिस्से में सुनाई देता है, जब मां अपने खोए हुए बच्चे की यादों में डूबी रहती है।

गीत के बोल और इसकी प्रस्तुति दर्शकों को सीधे कहानी की भावनाओं से जोड़ देती है। यही वजह है कि वर्षों बाद भी यह गीत केवल एक फिल्मी गाना नहीं, बल्कि कई परिवारों में बच्चों को सुनाई जाने वाली लोरी के रूप में भी याद किया जाता है।

लता मंगेशकर की आवाज ने बढ़ाया असर

इस गीत को स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी। उनकी मधुर और भावपूर्ण गायकी ने गीत की संवेदनशीलता को और गहरा बना दिया। गीत के शब्द प्रसिद्ध गीतकार अंजान ने लिखे थे, जिन्होंने सरल लेकिन असरदार भाषा में मां की ममता को अभिव्यक्त किया।

संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इस गीत को ऐसी धुन दी, जिसने इसे लंबे समय तक यादगार बनाए रखा। संगीत, शब्द और गायकी का यह संयोजन आज भी श्रोताओं को भावुक कर देता है।

फिल्म के संगीत को भी मिला था खूब प्यार

‘संजोग’ केवल अपनी कहानी के लिए ही नहीं, बल्कि अपने संगीत के लिए भी चर्चा में रही थी। फिल्म में कई प्रमुख गीत शामिल थे, जिन्हें लता मंगेशकर, आशा भोसले, किशोर कुमार, सुरेश वाडकर, एस. पी. शैलजा और कविता कृष्णमूर्ति जैसे दिग्गज गायकों ने अपनी आवाज दी थी।

फिल्म के सभी गीत कहानी के भावनात्मक पक्ष को आगे बढ़ाने का काम करते हैं। यही कारण है कि फिल्म का संगीत आज भी पुराने गीतों के प्रेमियों के बीच लोकप्रिय बना हुआ है।

दक्षिण भारतीय फिल्म से प्रेरित थी कहानी

कम लोगों को पता है कि ‘संजोग’ की कहानी मूल रूप से एक तेलुगू फिल्म पर आधारित थी। वर्ष 1975 में रिलीज हुई तेलुगू फिल्म ‘जीवन ज्योति’ की सफलता के बाद इसे हिंदी में नए रूप में प्रस्तुत किया गया।

हिंदी संस्करण का निर्देशन प्रसिद्ध फिल्मकार के. विश्वनाथ ने किया था। उन्होंने कहानी की भावनात्मक गहराई को बरकरार रखते हुए इसे हिंदी दर्शकों के अनुरूप प्रस्तुत किया, जिसे दर्शकों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी।

बॉक्स ऑफिस से लेकर टीवी तक कायम है लोकप्रियता

रिलीज के समय ‘संजोग’ को दर्शकों का अच्छा समर्थन मिला था और फिल्म ने व्यावसायिक सफलता भी हासिल की थी। समय के साथ कई नई फिल्में आईं, लेकिन ‘संजोग’ और उसके गीतों की लोकप्रियता कम नहीं हुई।

आज भी जब यह फिल्म टेलीविजन पर प्रसारित होती है, तो पुराने सिनेमा के प्रशंसक इसे देखना पसंद करते हैं। खासकर “यशोदा का नंदलाला” जैसे गीत इस बात का उदाहरण हैं कि सच्ची भावनाओं से जुड़े रचनात्मक कार्य समय बीतने के बाद भी अपनी पहचान बनाए रखते हैं।

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