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Lavani – श्रद्धा कपूर की नई फिल्म से फिर चर्चा में आया महाराष्ट्र का लोकनृत्य, पढ़ें इसकी अन्य जानकारी

Lavani- अभिनेत्री श्रद्धा कपूर की आगामी फिल्म ‘ईथा’ को लेकर चर्चा तेज है। इस फिल्म में वह प्रसिद्ध लावणी कलाकार विठाबाई नारायणगांवकर की भूमिका निभाती नजर आएंगी। फिल्म के सामने आने के बाद महाराष्ट्र की पारंपरिक लोकनृत्य शैली लावणी एक बार फिर लोगों की दिलचस्पी का केंद्र बन गई है। अपनी सशक्त प्रस्तुति, संगीत, अभिनय और पारंपरिक सौंदर्य के लिए पहचानी जाने वाली यह कला राज्य की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

lavani dance cultural history

मराठा काल से जुड़ा है लावणी का इतिहास

लावणी की शुरुआत 18वीं शताब्दी के आसपास मानी जाती है और इसका विकास मराठा शासन के दौर में हुआ। इतिहासकारों के अनुसार, पेशवा बाजीराव द्वितीय के शासनकाल में इस लोकनृत्य को विशेष संरक्षण मिला। शुरुआती समय में इसका मंचन मुख्य रूप से शाही दरबारों और विशेष आयोजनों तक सीमित था। बाद में यह लोकनाट्य ‘तमाशा’ का अहम हिस्सा बना और धीरे-धीरे ग्रामीण से लेकर शहरी समाज तक अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहा।

संगीत, अभिनय और अभिव्यक्ति का अनोखा मेल

लावणी केवल नृत्य नहीं, बल्कि संगीत और अभिनय का भी प्रभावशाली संगम है। इसकी प्रस्तुति ढोलकी और तबले की तेज लय पर होती है, जबकि नृत्यांगनाएं घुंघरुओं की ताल के साथ भावपूर्ण अभिनय करती हैं। चेहरे के हाव-भाव और आंखों की अभिव्यक्ति इस कला की सबसे बड़ी विशेषताओं में गिनी जाती है। इन्हीं माध्यमों से कलाकार गीतों में छिपे भाव और कहानी को दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाते हैं।

दो प्रमुख शैलियों में विकसित हुई परंपरा

लावणी की प्रस्तुति मुख्य रूप से दो अलग-अलग रूपों में देखने को मिलती है। पहली शैली शृंगारी लावणी कहलाती है, जिसमें प्रेम, सौंदर्य, विरह और मानवीय भावनाओं को केंद्र में रखा जाता है। दूसरी शैली निर्गुणी लावणी है, जो आध्यात्मिक विचारों, दर्शन और सामाजिक संदेशों को अभिव्यक्ति देती है। दोनों शैलियां अपने विषय और प्रस्तुति के कारण अलग पहचान रखती हैं।

पारंपरिक वेशभूषा बढ़ाती है आकर्षण

लावणी की पहचान उसकी पारंपरिक पोशाक और श्रृंगार से भी जुड़ी हुई है। प्रस्तुति के दौरान कलाकार आमतौर पर महाराष्ट्र की प्रसिद्ध नौवारी साड़ी पहनती हैं, जिसकी लंबाई लगभग नौ गज होती है। इसे विशेष शैली में पहनने से नृत्य के दौरान सहज गति और संतुलन बनाए रखने में सुविधा होती है। इसके साथ पारंपरिक आभूषण, पैरों में घुंघरू, माथे पर मराठी शैली की बिंदी, नथ और गजरे से सजा जूड़ा संपूर्ण वेशभूषा को आकर्षक बनाते हैं।

समय के साथ बढ़ी सांस्कृतिक पहचान

लावणी का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा, लेकिन इसकी सांस्कृतिक महत्ता आज भी बनी हुई है। पहले यह कला सीमित मंचों तक ही देखी जाती थी, जबकि अब सांस्कृतिक कार्यक्रमों, रंगमंच, फिल्मों और विभिन्न कला महोत्सवों के माध्यम से देशभर में इसकी प्रस्तुति होती है। श्रद्धा कपूर की नई फिल्म के कारण भी इस पारंपरिक लोकनृत्य और विठाबाई नारायणगांवकर के योगदान को लेकर लोगों में नई रुचि देखने को मिल रही है।

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