Constitution – जस्टिस अभय ओका ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जताई गंभीर चिंता
Constitution– सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और कर्नाटक व बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अभय एस. ओका ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकारों को लोकतंत्र की बुनियादी शर्त बताया है। मुंबई में आयोजित एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने कहा कि यदि असहमति की आवाजों को लगातार आपराधिक मामलों से जोड़ा जाता रहा और शांतिपूर्ण विरोध को दबाने की कोशिशें जारी रहीं, तो इसका असर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ेगा। उन्होंने अदालतों से भी ऐसे मामलों में संविधान की भावना के अनुरूप हस्तक्षेप करने का आग्रह किया।

अदालतों की भूमिका पर दिया स्पष्ट संदेश
मुंबई के केसी कॉलेज ऑडिटोरियम में आयोजित ‘एडवोकेट हारून सोल्कर मेमोरियल लेक्चर’ को संबोधित करते हुए जस्टिस ओका ने कहा कि जब किसी मामले में मौलिक अधिकारों का प्रश्न हो, तब अदालतों का प्रमुख दायित्व संविधान की रक्षा करना है। उनके अनुसार, न्यायालयों को यह तय करना चाहिए कि किसी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है या नहीं, न कि यह कि उसकी अभिव्यक्ति की शैली या भाषा कैसी थी। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं, तो अदालतों को उचित राहत देने से पीछे नहीं हटना चाहिए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रखा पक्ष
पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि किसी याचिकाकर्ता की बात अदालत को पसंद आए या नहीं, इससे उसके मौलिक अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा प्रभावित नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार, न्यायपालिका का दायित्व नागरिकों को यह बताना नहीं है कि उन्हें क्या कहना चाहिए था, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कानून के दायरे में उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि संविधान के मूल सिद्धांतों की रक्षा न्यायपालिका की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
शांतिपूर्ण विरोध को बताया लोकतंत्र की आवश्यकता
अपने संबोधन में जस्टिस ओका ने संविधान सभा की चर्चाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान निर्माताओं ने नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार दिया है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों को अपनी असहमति शांतिपूर्ण माध्यमों से व्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए। यदि नागरिकों के लिए विरोध दर्ज कराने के वैधानिक रास्ते सीमित कर दिए जाते हैं, तो लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित हो सकती है।
छात्रों को संविधान पढ़ने की दी सलाह
कार्यक्रम के प्रश्नोत्तर सत्र में एक छात्र ने अनुच्छेद 19 के तहत मिले अधिकारों और विरोध प्रदर्शनों के संबंध में सवाल किया। इस पर जस्टिस ओका ने युवाओं को संविधान को गहराई से पढ़ने और उसके प्रावधानों को समझने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जागरूक नागरिक ही अपने अधिकारों और कर्तव्यों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि किसी लोकतांत्रिक समाज में नागरिकों से केवल सरकार के अनुकूल विचार व्यक्त करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
संवैधानिक मूल्यों की रक्षा पर दिया जोर
अपने पूरे संबोधन में जस्टिस अभय ओका ने संविधान की सर्वोच्चता और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा को लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला बताया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की जिम्मेदारी केवल कानून की व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान में निहित अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उसका महत्वपूर्ण दायित्व है।