Sand Mining – बिहार में आधे से अधिक बालूघाटों की नीलामी अब भी लंबित…
Sand Mining – वित्तीय वर्ष 2026-27 के चार महीने गुजर जाने के बावजूद बिहार में 52 फीसदी से ज्यादा बालूघाटों की नीलामी पूरी नहीं हो सकी है। इसका सीधा असर राज्य के खनन राजस्व पर पड़ रहा है। विभागीय आकलन के अनुसार, नीलामी में देरी से सरकार को करीब 650 करोड़ रुपये से अधिक के संभावित राजस्व से वंचित होना पड़ रहा है। दूसरी ओर, जिन घाटों का संचालन शुरू नहीं हुआ है, वहां निगरानी की कमी के चलते अवैध खनन की आशंका भी बनी हुई है। वैध रूप से बालू की उपलब्धता सीमित रहने पर बाजार में इसकी कीमत बढ़ने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

खान एवं भूतत्व विभाग ने मांगी विस्तृत रिपोर्ट
खान एवं भूतत्व विभाग ने बड़ी संख्या में बालूघाटों के अब तक नीलाम नहीं होने को गंभीरता से लिया है। विभाग ने सभी सहायक निदेशकों और खनिज विकास पदाधिकारियों को अपने-अपने जिलों में लंबित नीलामी की स्थिति की समीक्षा करने का निर्देश दिया है। अधिकारियों से नीलामी में आ रही बाधाओं की जानकारी जुटाकर रिपोर्ट देने को कहा गया है। इसके साथ ही जिलाधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित कर जल्द निविदा जारी करने और नीलामी की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।
पीले और सफेद बालू के घाटों की स्थिति
राज्य में पीले बालू के 466 और सफेद बालू के 541 घाट चिन्हित हैं। इनमें पीले बालू के 378 घाटों की नीलामी हो चुकी है, लेकिन केवल 199 घाट ही फिलहाल संचालित हैं। सफेद बालू के मामले में 541 में से सिर्फ 103 घाटों की नीलामी पूरी हुई है और इनमें भी 37 घाटों पर संचालन शुरू हो पाया है। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक सफेद बालू के 438 घाट अभी नीलाम नहीं हुए हैं। जिन घाटों की नीलामी हो चुकी है, उनमें से कई पर्यावरणीय स्वीकृति और अन्य आवश्यक अनुमतियां नहीं मिलने के कारण शुरू नहीं हो सके हैं।
15 अक्टूबर तक खनन पर रोक
मानसून अवधि के कारण राज्य में बालू खनन पर फिलहाल 15 अक्टूबर तक रोक लागू है। हालांकि बंदोबस्तधारियों को पहले से खनन कर जमा किए गए बालू के भंडारण और उसकी बिक्री के लिए लाइसेंस दिया गया है। ऐसे में उपलब्ध भंडार से बाजार की जरूरत पूरी करने की कोशिश की जा रही है। नई नीलामी और घाटों के संचालन में देरी जारी रहने पर आने वाले समय में वैध आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है।
लोक सुनवाई और पर्यावरणीय स्वीकृति बनी बाधा
कई घाटों की बंदोबस्ती अलग-अलग प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अटकी हुई है। जिलावार लोक सुनवाई नहीं होने के कारण औरंगाबाद के 12 और अरवल के 11 समेत कुल 36 बालूघाट लंबित हैं। इन घाटों की प्रक्रिया पूरी नहीं होने से लगभग 250 करोड़ रुपये के राजस्व पर असर पड़ने का अनुमान है। इसके अलावा 10 जिलों के 33 घाटों के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति लंबे समय से लंबित बताई गई है, जिससे करीब 250 करोड़ रुपये के संभावित राजस्व का नुकसान होने की बात सामने आई है।
टर्म ऑफ रेफरेंस और खनन योजना भी लंबित
औरंगाबाद और पटना के छह-छह, अरवल के पांच, मुजफ्फरपुर के चार और मधुबनी के तीन बालूघाट भी विभिन्न कारणों से प्रक्रिया में अटके हैं। वहीं पटना के सात और बांका के चार सहित 22 घाटों की बंदोबस्ती टर्म ऑफ रेफरेंस तैयार नहीं होने के कारण आगे नहीं बढ़ सकी है। विभागीय अनुमान के अनुसार, इससे करीब 150 करोड़ रुपये के राजस्व पर असर पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त 18 घाटों की जिला खनन योजना अभी तैयार नहीं हुई है। इनकी बंदोबस्ती पूरी होने के बाद लगभग 34.55 करोड़ रुपये का राजस्व मिलने का अनुमान है।
सरकार के सामने राजस्व और आपूर्ति दोनों की चुनौती
बालूघाटों की लंबित नीलामी का मामला केवल सरकारी राजस्व तक सीमित नहीं है। पर्याप्त घाटों का संचालन नहीं होने पर निर्माण कार्यों के लिए बालू की वैध आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और इसका असर स्थानीय बाजार पर पड़ सकता है। साथ ही, बंद घाटों की प्रभावी निगरानी जरूरी है ताकि अवैध खनन की किसी भी संभावना पर रोक लगाई जा सके। अब विभाग की समीक्षा और जिला प्रशासन के साथ समन्वय से यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि लंबित प्रक्रियाओं को कितनी तेजी से पूरा किया जाता है।