उत्तर प्रदेश

Allahabad High Court Legal Verdict: क्या आजीविका का अधिकार मिटा सकता है बेटी के साथ किए गए कुकर्मों का दाग…

Allahabad High Court Legal Verdict: न्याय के गलियारों से एक ऐसी खबर आई है जिसने कानूनी और सामाजिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सरकारी कर्मचारी (लेखपाल) की उम्रकैद की सजा पर रोक लगाते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति के (Right to Livelihood) यानी आजीविका के अधिकार को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता है। यह फैसला उस पिता के पक्ष में आया है, जिस पर अपनी ही 16 साल की नाबालिग बेटी के साथ गंभीर यौन शोषण जैसा घिनौना आरोप लगा है।

Allahabad High Court Legal Verdict
Allahabad High Court Legal Verdict

उम्रकैद की सजा और पॉक्सो एक्ट का मामला

यह पूरा मामला बेहद संवेदनशील है, जिसमें निचली अदालत ने पिछले साल मई में आरोपी पिता को पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराया था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को गंभीर यौन उत्पीड़न, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने जैसे (POCSO Act Conviction) के आरोपों में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही आरोपी के एक दोस्त और तलाक के मामले में उसके वकील को भी इस जघन्य अपराध में शामिल होने के कारण आजीवन कारावास की सजा मिली थी, जिसे अब हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है।

पीठ की टिप्पणी और केसों का भारी बोझ

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा-I की खंडपीठ कर रही है। बेंच ने सजा को निलंबित करते हुए यह तर्क दिया कि यह अपील 2024 की है और वर्तमान में (Judicial Backlog Issues) के कारण निकट भविष्य में इस पर अंतिम सुनवाई होने की संभावना बेहद कम है। कोर्ट का मानना है कि केवल आरोपी होने या दोषसिद्धि की प्रक्रिया के दौरान किसी व्यक्ति को उसकी रोजी-रोटी कमाने के मौलिक अधिकार से वंचित रखना न्यायोचित नहीं होगा, विशेषकर तब जब अपील लंबित हो।

क्या था गंभीर आरोप और प्राथमिकी की कहानी

इस मामले की शुरुआत 12 जनवरी 2020 को हुई थी, जब आरोपी की अलग रह रही पत्नी ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, आरोपी पिता अपनी बेटी का यौन शोषण (Allegations of Sexual Harassment) तब से कर रहा था जब वह महज 10 साल की थी और तीसरी कक्षा में पढ़ती थी। मां ने आरोप लगाया कि जब उसने बेटी को बचाने के लिए जयपुर के एक बोर्डिंग स्कूल भेजा, तब भी आरोपी पिता उसे होटलों में ले जाकर अपने दोस्तों के साथ मिलकर उसका शोषण करता रहा।

जबरन गर्भपात और प्रताड़ना का सनसनीखेज दावा

प्राथमिकी में जो सबसे चौंकाने वाला खुलासा हुआ, वह यह था कि शोषण के कारण लड़की गर्भवती हो गई थी और उसे जबरन गर्भपात करने पर मजबूर किया गया। आरोप यह भी था कि इस (Forced Abortion Case) में आरोपी की मां और उसकी दूसरी पत्नी भी शामिल थीं। शिकायतकर्ता महिला ने बताया कि विरोध करने पर उसे और उसकी बेटी को बेरहमी से पीटा गया और डराया-धमकाया गया, जिसके कारण वे लंबे समय तक खामोश रहे।

बचाव पक्ष की दलील: साजिश या सच्चाई?

आरोपी लेखपाल के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी कि उनका मुवक्किल अपनी पत्नी की गहरी साजिश का शिकार हुआ है। वकीलों ने बताया कि पति-पत्नी सालों से अलग रह रहे थे और आरोपी ने 4 जनवरी 2020 को (Divorce Petition Filing) दाखिल की थी। उनका तर्क था कि तलाक की अर्जी के ठीक आठ दिन बाद, जवाबी कार्रवाई के तौर पर यह बलात्कार की एफआईआर दर्ज कराई गई। बचाव पक्ष ने इसे पूरी तरह से एक पारिवारिक विवाद और प्रतिशोध की कार्रवाई करार दिया।

विरोधाभासी बयान और मेडिकल रिपोर्ट का आधार

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कोर्ट का ध्यान पीड़िता और उसकी मां के बयानों में मौजूद भारी विरोधाभासों की ओर खींचा। कोर्ट को बताया गया कि पीड़िता की (Medical Legal Examination) में किसी भी प्रकार की बाहरी या अंदरूनी चोट के निशान नहीं मिले, जो बलात्कार के दावों पर सवाल खड़े करते हैं। वकीलों का कहना था कि मां ने अपनी बेटी को बहला-फुसलाकर और सिखा-पढ़ाकर पिता के खिलाफ झूठे आरोप लगाने के लिए तैयार किया है।

बोर्डिंग स्कूल और मोबाइल फोन का विवाद

आरोपी पिता के पक्ष में एक और दलील दी गई कि उसने अपनी बेटी को अच्छे भविष्य के लिए बोर्डिंग स्कूल भेजा था। विवाद तब शुरू हुआ जब स्कूल अधिकारियों ने लड़की के पास से एक प्रतिबंधित मोबाइल फोन जब्त किया। पिता द्वारा (Parental Disciplinary Action) के तौर पर उसे डांटने के कारण बेटी नाराज हो गई और अपनी मां के उकसावे में आकर उसने इतना बड़ा कदम उठाया। सरकारी वकील ने इन दलीलों का विरोध तो किया, लेकिन वह ठोस सबूतों के साथ इनका खंडन करने में असमर्थ रहे।

दोषसिद्धि निलंबित और जमानत मंजूर

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को फिलहाल निलंबित कर दिया है और उसकी जमानत मंजूर कर ली है। कोर्ट ने (Suspension of Sentence) का आदेश देते हुए आरोपी को जेल से बाहर आने और अपनी आजीविका चलाने की अनुमति दे दी है। हालांकि, यह राहत अंतिम नहीं है और मामले की अंतिम सुनवाई अभी बाकी है, लेकिन इस फैसले ने ‘आजीविका के अधिकार’ बनाम ‘जघन्य अपराध के आरोपों’ के बीच एक नई कानूनी लकीर खींच दी है।

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