Encroachment Dispute in Bijnor: सिस्टम और समाज पर लगा कलंक, शौचालय के ऊपर से निकली अर्थी
Encroachment Dispute in Bijnor: उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने आधुनिक समाज और प्रशासनिक संवेदनशीलता के दावों की पोल खोलकर रख दी है। कोतवाली देहात क्षेत्र के गांव महमूदपुर भावता में एक पड़ोसी की जिद और अवैध कब्जे के कारण एक बेबस पति को अपनी पत्नी की (Dead Body Disrespect) का सामना करना पड़ा। कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझकर दम तोड़ने वाली महिला को मौत के बाद भी सुकून नसीब नहीं हुआ और उसकी अर्थी 24 घंटे तक घर के भीतर ही कैद रही।

कैंसर की जंग हारी पर तंत्र से हार गया परिवार
गांव के निवासी सोनू कुमार की 30 वर्षीय पत्नी ज्योति लंबे समय से कैंसर से पीड़ित थी और बुधवार दोपहर को उसने अंतिम सांस ली। मौत के बाद जब अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हुई, तो परिवार के सामने (Land Dispute Issues) की एक दीवार खड़ी हो गई। सोनू के घर तक जाने वाला रास्ता इतना संकरा हो चुका था कि वहां से शव को सम्मानपूर्वक बाहर निकालना भी असंभव हो गया था। इस स्थिति ने पीड़ित परिवार को मानसिक और भावनात्मक रूप से तोड़कर रख दिया।
छह फीट के रास्ते को तीन फीट में समेटने की साजिश
सोनू और उसका भाई अपने पड़ोसियों टीकम और विजय सिंह के घर के पीछे वाले हिस्से में रहते हैं, जहाँ जाने के लिए आधिकारिक तौर पर छह फीट का रास्ता निर्धारित था। आरोप है कि पड़ोसी ने अपनी दबंगई दिखाते हुए उस (Path Access Encroachment) पर अवैध रूप से शौचालय का निर्माण कर लिया, जिससे आम रास्ता घटकर मात्र तीन फीट रह गया। सोनू का दावा है कि उसने इस अतिक्रमण के खिलाफ पहले भी कई बार आला अधिकारियों के दरवाजे खटखटाए, लेकिन फाइलें धूल फांकती रहीं।
24 घंटे तक घर में ही रखा रहा महिला का शव
पत्नी की मौत के बाद सोनू ने हाथ जोड़कर प्रशासन और ग्रामीणों से रास्ता खुलवाने की गुहार लगाई ताकि अंतिम यात्रा निकाली जा सके, लेकिन व्यवस्था की (Administrative Negligence) ऐसी थी कि किसी का दिल नहीं पसीजा। मौत के गम से ज्यादा बड़ा बोझ पड़ोसियों का वह अतिक्रमण बन गया जिसने एक शव को बाहर निकलने का हक तक नहीं दिया। मजबूरी और लाचारी में डूबे पति ने आखिरकार गुरुवार को पुलिस से न्याय की गुहार लगाई, तब जाकर मामला सुर्खियों में आया।
शौचालय की छत से निकाली गई ज्योति की अर्थी
जब पुलिस मौके पर पहुँची और देखा कि स्थिति नियंत्रण से बाहर है, तो उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना जिसने पूरे गांव की आँखों में आंसू ला दिए। पुलिसकर्मियों ने (Insensitive Handling of Dead) के इस मामले को सुलझाने के लिए मृतका की अर्थी को पड़ोसी द्वारा बनाए गए उसी शौचालय के ऊपर से चढ़ाकर बाहर निकाला। जिस समाज में मृत्यु के बाद गरिमा की बात की जाती है, वहां एक महिला की अंतिम यात्रा को शौचालय की छतों से होकर गुजरना पड़ा।
पीछे छूट गए तीन मासूम और व्यवस्था पर अनगिनत सवाल
ज्योति अपने पीछे तीन छोटे-छोटे बच्चों को रोता-बिलखता छोड़ गई है, जिन्हें शायद अभी यह भी नहीं पता कि उनकी मां अब कभी वापस नहीं आएगी। ग्रामीणों में इस घटना को लेकर (Public Anger Against System) चरम पर है। लोगों का कहना है कि यदि प्रशासन समय रहते अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई करता, तो आज एक मृत शरीर को इस तरह अपमानित नहीं होना पड़ता। यह घटना सरकारी तंत्र की उस सुस्ती का प्रमाण है जो गरीब की शिकायतों को रद्दी के भाव तौलती है।
पुलिस का दावा और कानूनी कार्रवाई का आश्वासन
इस पूरे मामले पर सीओ नगीना, अंजनी चतुर्वेदी का कहना है कि दोनों पक्ष एक ही बिरादरी के हैं और रास्ता तंग होने की वजह से समस्या उत्पन्न हुई थी। उन्होंने बताया कि (Police Intervention in Dispute) के बाद अर्थी को सम्मानपूर्वक निकलवा दिया गया और अब अंतिम संस्कार संपन्न हो चुका है। पुलिस का यह भी कहना है कि मौके पर किसी भी तरह का बड़ा विवाद नहीं था और अब राजस्व विभाग की टीम पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है।
कानूनगो और लेखपाल को सौंपी गई जांच की जिम्मेदारी
प्रशासन ने अब मामले को शांत करने के लिए हल्का लेखपाल और कानूनगो को अतिक्रमण की जांच के निर्देश दिए हैं। सवाल यह उठता है कि क्या (Justice After Death) ही अब एकमात्र विकल्प बचा है? सोनू के अनुसार अगर जांच पहले हुई होती, तो उसे अपनी पत्नी की अर्थी को शौचालय की छत से नहीं उतारना पड़ता। फिलहाल गांव में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है और लोग इस घटना को बिजनौर के इतिहास का एक काला अध्याय मान रहे हैं।



