बिहार

ArchaeologicalExcavation – बलिराजगढ़ में प्राचीन शहर की खोज को मिली एएसआई की मंजूरी

ArchaeologicalExcavation – मिथिला क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व से जुड़े बलिराजगढ़ में व्यापक पुरातात्विक उत्खनन का रास्ता साफ हो गया है। मधुबनी जिले में स्थित इस संरक्षित स्थल पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने विधिवत खुदाई की अनुमति दे दी है। माना जाता है कि यहां धरती के भीतर एक प्राचीन नगर के अवशेष दबे हो सकते हैं, जिनकी उम्र करीब साढ़े तीन हजार वर्ष बताई जाती है। पटना सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ. हरिओम शरण की देखरेख में यह उत्खनन कार्य कराया जाएगा।

balirajgarh ancient city excavation approved

लंबे समय से उठ रही थी मांग

बलिराजगढ़ को बिहार के सबसे बड़े पुरातात्विक स्थलों में गिना जाता है। इसके व्यवस्थित उत्खनन की मांग कई दशकों से की जा रही थी। इतिहासकारों और सांस्कृतिक संगठनों का मानना है कि यहां छिपे साक्ष्य मिथिला की प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक परंपरा को नई रोशनी में सामने ला सकते हैं। इन्टैक से जुड़े पुरातत्वविद् डॉ. शिव कुमार मिश्र ने कहा कि यदि व्यापक स्तर पर खुदाई होती है तो क्षेत्र के गौरवशाली अतीत से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य उजागर हो सकते हैं।

पहले भी हो चुकी है सीमित खुदाई

बलिराजगढ़ में इससे पहले भी अलग-अलग समय पर उत्खनन हुआ है। वर्ष 1962 और 2013-14 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने यहां खुदाई कराई थी। इसके अलावा 1970 के दशक में राज्य सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय ने भी कार्य किया था। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि ये प्रयास सीमित दायरे में थे। पूर्व में मिले अवशेषों में उत्तरी कृष्णा मृदभांड संस्कृति के प्रमाण पाए गए थे, जिससे संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र कभी एक विकसित नगरीय केंद्र रहा होगा।

रामायण काल से जुड़ाव की चर्चा

बलिराजगढ़ के चारों ओर फैली विशाल परिधि और मजबूत प्राचीरों को देखकर अनुमान लगाया जाता है कि यह किसी प्रभावशाली शासक की राजधानी रही होगी। कई विद्वान इसे मिथिला के जनक वंश से जोड़कर देखते हैं। रामायण में वर्णित प्रसंगों के आधार पर यह संभावना जताई जाती है कि राजा जनक की राजधानी इसी क्षेत्र में रही हो सकती है। हालांकि इन दावों की पुष्टि के लिए ठोस पुरातात्विक साक्ष्य आवश्यक हैं, जो आगामी खुदाई से सामने आ सकते हैं।

कानूनी और सामाजिक पहल

इस स्थल के व्यापक उत्खनन को लेकर सामाजिक और बौद्धिक वर्ग लगातार सक्रिय रहा है। विभिन्न संगठनों ने सरकार से पहल करने की अपील की थी। पटना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर की गई थी, जिसमें बलिराजगढ़ के संरक्षण और उत्खनन की मांग उठाई गई थी। अब एएसआई की स्वीकृति को इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

संरक्षण और संग्रहालय की मांग

विशेषज्ञों का मानना है कि खुदाई के साथ-साथ वहां से मिलने वाले अवशेषों के संरक्षण की भी ठोस व्यवस्था होनी चाहिए। स्थानीय इतिहासकारों ने साइट म्यूजियम की स्थापना का सुझाव दिया है, ताकि प्राप्त वस्तुओं को सुरक्षित रखा जा सके और आम लोगों को भी क्षेत्र के इतिहास की जानकारी मिल सके। पूर्व में हुई खुदाई की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की भी मांग की जा रही है।

ऐतिहासिक महत्व और संभावनाएं

मधुबनी शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित बलिराजगढ़ को वर्ष 1938 में राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित किया गया था। पूर्व उत्खननों में यहां गुप्त, शुंग, कुषाण और पाल काल से जुड़े अवशेष मिले हैं। मोटी ईंटों से बनी दीवारें इस क्षेत्र की प्राचीन वास्तुकला का संकेत देती हैं। लोक मान्यताओं में इसे असुर राजा बलि की राजधानी भी बताया जाता है, जबकि कुछ इतिहासकार इसे जनक वंश के अंतिम शासकों से जोड़ते हैं।

अब जब व्यवस्थित उत्खनन की तैयारी है, तो उम्मीद की जा रही है कि मिथिला के इतिहास से जुड़े कई अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर मिल सकेंगे। आने वाले महीनों में यह कार्य क्षेत्रीय इतिहास और सांस्कृतिक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

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