बिहार

AyushMedicines – बिहार के सरकारी अस्पतालों में पांच महीने से छाया दवाओं का संकट

AyushMedicines – बिहार के सरकारी अस्पतालों में आयुष पद्धति से जुड़ी दवाओं की कमी अब गंभीर समस्या बनती जा रही है। जिला अस्पतालों से लेकर अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक बीते पांच महीनों से आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी दवाओं की आपूर्ति ठप पड़ी है। इसका असर राज्यभर के हजारों मरीजों पर पड़ रहा है, जो इलाज के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर हैं। स्वास्थ्य विभाग की प्रक्रियात्मक देरी के कारण करीब 13 हजार से अधिक स्वास्थ्य संस्थानों में दवाएं उपलब्ध नहीं हो सकी हैं।

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खरीद प्रक्रिया में देरी बनी बड़ी वजह

स्वास्थ्य विभाग ने पिछले वर्ष आयुष दवाओं की खरीद की जिम्मेदारी बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीएमएसआईसीएल) को सौंपने का फैसला लिया था। दिसंबर 2025 में दवाओं की खरीद के लिए पत्र भी जारी किया गया था, लेकिन कई महीने बीतने के बावजूद अब तक निविदा प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। अधिकारियों के अनुसार पहले आवश्यक दवाओं की सूची तैयार करने में देरी हुई और उसके बाद खरीद को लेकर अंतिम निर्णय लंबित रह गया।

इस प्रशासनिक सुस्ती का सीधा असर अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों पर दिखाई दे रहा है। राज्य सरकार मुफ्त और बेहतर इलाज का दावा करती रही है, लेकिन अस्पतालों में जरूरी दवाओं की अनुपलब्धता इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है।

आयुष चिकित्सकों के सामने बढ़ी परेशानी

राज्य सरकार ने पिछले वर्ष बड़ी संख्या में आयुष चिकित्सकों की नियुक्ति की थी। वर्तमान में करीब 4365 आयुष डॉक्टर विभिन्न सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात हैं। इनमें सदर अस्पताल, अनुमंडलीय अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र शामिल हैं। इन चिकित्सकों के वेतन पर हर महीने करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।

हालांकि दवाओं की कमी के चलते डॉक्टरों को अपने मरीजों को वैकल्पिक रूप से एलोपैथिक दवाएं लिखनी पड़ रही हैं। कई डॉक्टरों का कहना है कि मरीज आयुष चिकित्सा पद्धति पर भरोसा करते हैं और उसी उम्मीद से अस्पताल पहुंचते हैं, लेकिन दवा उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें निराश होकर लौटना पड़ता है।

बाजार से दवा खरीदने को मजबूर मरीज

अस्पतालों में दवा नहीं मिलने से मरीजों की जेब पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। जिन डॉक्टरों द्वारा आयुष दवाएं लिखी भी जा रही हैं, उन्हें मरीजों को बाहर की दुकानों से खरीदना पड़ रहा है। ग्रामीण इलाकों से आने वाले कई मरीज आर्थिक रूप से कमजोर हैं और नियमित दवा खरीद पाना उनके लिए मुश्किल हो जाता है।

कैमूर जिले के सदर अस्पताल में तैनात एक आयुष चिकित्सक ने बताया कि मरीज अक्सर अस्पताल में दवा नहीं मिलने पर नाराजगी जताते हैं। उन्होंने कहा कि कई बार हालात इतने खराब हो जाते हैं कि मरीज और उनके परिजन हंगामा करने लगते हैं। डॉक्टरों के अनुसार वे भी इस स्थिति से असहज हैं क्योंकि बिना दवा के इलाज अधूरा माना जाता है।

स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवाल

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द दवा आपूर्ति बहाल नहीं हुई तो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग आयुष चिकित्सा पद्धति पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में दवाओं की लगातार कमी लोगों को निजी अस्पतालों और महंगी चिकित्सा सेवाओं की ओर धकेल सकती है।

स्वास्थ्य विभाग की ओर से फिलहाल खरीद प्रक्रिया को जल्द पूरा करने की बात कही जा रही है, लेकिन अस्पतालों में दवा पहुंचने तक मरीजों की परेशानी बनी रहने की संभावना है। राज्यभर के अस्पतालों में आयुष दवाओं की उपलब्धता अब स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।

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