FuelStability – ईंधन कीमतों को थामने के लिए सरकार की नई तैयारी
FuelStability – देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार एक नई वित्तीय व्यवस्था पर काम कर रही है। इस प्रस्ताव के तहत एक विशेष फंड बनाने की योजना है, जिसका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप करने के लिए किया जाएगा। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर कम से कम पड़े।

कीमतों में अस्थिरता की वजह
सरकारी सूत्रों के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों के चलते कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेजी आई है और अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे हालात में घरेलू बाजार में भी ईंधन की कीमतें बढ़ने का खतरा रहता है, जिससे महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। इसी पृष्ठभूमि में यह प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है।
मौजूदा व्यवस्था से प्रेरित योजना
सरकार पहले से ही जरूरी खाद्य वस्तुओं जैसे दाल, प्याज, आलू और टमाटर की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए एक स्थिरता कोष का उपयोग करती रही है। इस फंड के जरिए जरूरत पड़ने पर बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति की जाती है, जिससे कीमतें काबू में रहती हैं। अब इसी मॉडल को ईंधन क्षेत्र में लागू करने पर विचार किया जा रहा है। हाल ही में इस विषय पर उच्चस्तरीय बैठकों में चर्चा भी हुई है।
कैसे काम करेगा प्रस्तावित फंड
इस योजना के तहत सरकार पेट्रोल, डीजल और एलपीजी का एक सीमित भंडार तैयार करेगी। इसके लिए तेल रिफाइनरी कंपनियों के साथ समन्वय किया जाएगा। जब वैश्विक स्तर पर कीमतें अचानक बढ़ेंगी या आपूर्ति बाधित होगी, तब इस भंडार का उपयोग बाजार में किया जाएगा। इससे सप्लाई बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिलेगी।
सब्सिडी से अलग रहेगा तरीका
अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह योजना पारंपरिक सब्सिडी मॉडल से अलग होगी। इसका उद्देश्य नियमित रूप से कीमतों में राहत देना नहीं, बल्कि असामान्य परिस्थितियों में हस्तक्षेप करना है। जब कीमतें असामान्य रूप से बढ़ेंगी, तभी इस फंड के जरिए बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति की जाएगी।
रणनीतिक भंडार से अलग पहचान
यह नया प्रस्ताव देश के मौजूदा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से अलग होगा। वर्तमान में भारत के पास लगभग 5.3 मिलियन टन कच्चे तेल का भंडार है, जिसका उपयोग आपात स्थितियों में किया जाता है। जबकि प्रस्तावित फंड का उद्देश्य सीधे तौर पर कीमतों को संतुलित करना होगा, न कि केवल आपूर्ति संकट से निपटना।
वैश्विक हालात का असर
हाल के महीनों में कच्चे तेल की कीमतें करीब 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर लगभग 100 डॉलर तक पहुंच गई हैं। हार्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति प्रभावित होने के कारण स्थिति और जटिल हो गई है। इसका असर घरेलू बाजार पर भी देखने को मिला है, जहां कुछ निजी विक्रेताओं ने कीमतों में बढ़ोतरी की है।
सरकारी कंपनियों पर दबाव
सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की है, लेकिन इसके बावजूद सरकारी तेल कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। अनुमान है कि उन्हें प्रति लीटर पेट्रोल पर करीब 25 रुपये और डीजल पर 100 रुपये से अधिक का घाटा हो रहा है। वहीं, कमर्शियल एलपीजी के दाम भी बढ़े हैं और इसकी उपलब्धता पर असर पड़ा है।
भंडारण क्षमता बढ़ाने की जरूरत
इस योजना को लागू करने के लिए अतिरिक्त भंडारण क्षमता विकसित करनी होगी। फिलहाल रिफाइनरी कंपनियों के पास सीमित स्टोरेज है, जो उनके नियमित संचालन के लिए पर्याप्त है। लेकिन नए फंड के तहत अलग से भंडारण व्यवस्था तैयार करनी पड़ेगी, जिसके लिए निवेश और समय दोनों की आवश्यकता होगी।
विशेषज्ञों की राय
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस तरह का फंड व्यावहारिक हो सकता है, बशर्ते इसे सही तरीके से लागू किया जाए। उनका कहना है कि आवश्यक वस्तुओं की तरह यदि ईंधन के क्षेत्र में भी सीमित हस्तक्षेप किया जाए, तो कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित किया जा सकता है और उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है।



