Shailendra – ये थे दोस्ती, सपनों और एक फिल्म की कीमत चुकाने वाले गीतकार
Shailendra – हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिनकी रचनाएं समय बीतने के बाद भी लोगों के दिलों में जीवित रहती हैं। ऐसे ही गीतकारों में शैलेंद्र का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। उनके लिखे गीतों ने न सिर्फ फिल्मों को यादगार बनाया, बल्कि भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मशहूर लेखक और फिल्मकार गुलजार भी कई बार स्वीकार कर चुके हैं कि वे शैलेंद्र के लेखन से गहराई से प्रभावित रहे हैं।

शैलेंद्र ने चार और पांच दशक के दौरान अनेक कालजयी गीत लिखे। उनकी लेखनी ने राज कपूर की फिल्मों को खास पहचान दी। “आवारा हूं”, “मेरा जूता है जापानी”, “प्यार हुआ इकरार हुआ” और “जीना यहां मरना यहां” जैसे गीत आज भी संगीत प्रेमियों की पसंद बने हुए हैं। इन रचनाओं ने राज कपूर की लोकप्रियता को देश की सीमाओं से बाहर तक पहुंचाने में मदद की।
गीतकार से निर्माता बनने का सपना
सफल गीतकार के रूप में पहचान बनाने के बाद शैलेंद्र ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने करीबी मित्र राज कपूर के साथ एक फिल्म बनाने की इच्छा जताई। यह कहानी प्रसिद्ध साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु की रचना “मारे गए गुलफाम” से प्रेरित थी। जब शैलेंद्र ने इसकी कहानी राज कपूर को सुनाई तो वे काफी प्रभावित हुए और फिल्म में काम करने के लिए तैयार हो गए।
इस दौरान एक दिलचस्प घटना भी सामने आई। कहा जाता है कि राज कपूर ने मजाकिया अंदाज में एडवांस फीस की बात की। जब शैलेंद्र चिंता में पड़ गए तो राज कपूर ने उनसे केवल एक सिक्का लेकर उसे अपनी अग्रिम राशि घोषित कर दिया। यह घटना दोनों के बीच गहरी दोस्ती की मिसाल मानी जाती है।
‘तीसरी कसम’ की निर्माण यात्रा
फिल्म का नाम बाद में “तीसरी कसम” रखा गया। राज कपूर को मुख्य भूमिका में लिया गया, जबकि अभिनेत्री के चयन को लेकर भी चर्चा हुई। शुरुआती योजना में मीना कुमारी का नाम सामने आया था, लेकिन व्यस्तता के कारण यह संभव नहीं हो सका। इसके बाद वहीदा रहमान को फिल्म में शामिल किया गया। निर्देशन की जिम्मेदारी बासु भट्टाचार्य ने संभाली।
फिल्म की सबसे बड़ी चुनौती इसकी कहानी का अंत था। उस दौर में दर्शक प्रायः सुखद अंत वाली फिल्मों को पसंद करते थे, लेकिन शैलेंद्र और मूल लेखक रेणु कहानी के मूल स्वरूप से समझौता नहीं करना चाहते थे। इसलिए फिल्म का अंत भावनात्मक और यथार्थवादी रखा गया, जिसमें मुख्य पात्र एक नहीं हो पाते।
रिलीज के बाद नहीं मिला अपेक्षित साथ
साल 1966 में जब “तीसरी कसम” सिनेमाघरों में पहुंची तो समीक्षकों ने इसकी सराहना की, लेकिन टिकट खिड़की पर इसे उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। दर्शकों का एक बड़ा वर्ग फिल्म के गंभीर और दुखांत अंत से जुड़ नहीं पाया। परिणामस्वरूप यह फिल्म व्यावसायिक रूप से कमजोर साबित हुई।
फिल्म में भारी निवेश कर चुके शैलेंद्र के लिए यह झटका बेहद बड़ा था। बताया जाता है कि आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। धीरे-धीरे उन्होंने फिल्मी गतिविधियों से दूरी बना ली और उनका स्वास्थ्य भी प्रभावित होने लगा।
बाद में मिली राष्ट्रीय पहचान
विडंबना यह रही कि जिस फिल्म को अपने समय में अपेक्षित सफलता नहीं मिली, उसी “तीसरी कसम” को बाद में राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त हुआ। फिल्म ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता और भारतीय सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में अपनी जगह बनाई।
आज “तीसरी कसम” को एक ऐसी कृति माना जाता है जिसने समय के साथ अपनी असली पहचान हासिल की। शैलेंद्र भले ही उस सम्मान को देखने के लिए जीवित नहीं रहे, लेकिन उनकी रचनात्मक दृष्टि और सिनेमा के प्रति समर्पण आज भी प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।