Digital Fatigue: डिजिटल स्क्रीन का बढ़ता मोह और मानसिक सेहत, विशेषज्ञों ने दी गंभीर न्यूरोलॉजिकल खतरे की चेतावनी
Digital Fatigue: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हमारी आंखें किसी न किसी स्क्रीन से चिपकी रहती हैं। चाहे दफ्तर का काम हो या रात के सन्नाटे में सोशल मीडिया पर डूमस्क्रॉलिंग, तकनीक हमारे अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह निरंतर चलने वाला डिजिटल सफर हमारे मस्तिष्क को किस हद तक खोखला कर रहा है? यथार्थ हॉस्पिटल्स के वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. कुणाल भरानी के मुताबिक, सूचनाओं का यह अंतहीन प्रवाह हमारे दिमाग को विश्राम देने के बजाय उसे चौबीसों घंटे सक्रिय रखता है। नतीजतन, मस्तिष्क ‘ओवरवर्क’ का शिकार हो रहा है, जिससे मानसिक थकावट एक महामारी की तरह फैल रही है।

क्या है डिजिटल फटीग और क्यों है यह खतरनाक?
डॉ. भरानी स्पष्ट करते हैं कि मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप का बेतहाशा इस्तेमाल हमारे मस्तिष्क को लगातार उत्तेजित (Stimulate) रखता है। जब दिमाग को शांत होने का समय नहीं मिलता, तो वह ‘डिजिटल फटीग’ की स्थिति में चला जाता है। यह महज सामान्य थकान नहीं, बल्कि एक जटिल न्यूरोलॉजिकल समस्या है। इसके लक्षणों में एकाग्रता की कमी, याददाश्त का धुंधला होना (ब्रेन फॉग) और नींद का चक्र पूरी तरह बिगड़ जाना शामिल है। अस्पतालों में अब हर उम्र के मरीज इस मानसिक बोझ और ओवरलोड की शिकायत लेकर आ रहे हैं, जो भविष्य के लिए एक बड़ा खतरे का संकेत है।
निर्णय लेने की क्षमता और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर चोट
लगातार एक ऐप से दूसरे ऐप पर स्विच करना या मल्टीटास्किंग करना हमारे मस्तिष्क की गहराई से सोचने की शक्ति को खत्म कर रहा है। डॉ. भरानी के अनुसार, बार-बार ध्यान भटकने (Attention Switching) से दिमाग कभी भी ‘डीप फोकस’ मोड में नहीं जा पाता। इस कारण व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होने लगती है और वह हमेशा एक ‘रिएक्टिव मोड’ में रहता है। यही वजह है कि बिना किसी खास शारीरिक मेहनत के भी लोग हर वक्त चिड़चिड़ेपन और मानसिक शून्यता का अनुभव करते हैं।
शरीर में बढ़ता कोर्टिसोल और याददाश्त का संकट
अत्यधिक स्क्रीन टाइम का असर केवल दिमाग तक सीमित नहीं रहता, यह हमारे हार्मोनल संतुलन को भी बिगाड़ देता है। शोध बताते हैं कि स्क्रीन के ज्यादा इस्तेमाल से शरीर में कोर्टिसोल, जिसे ‘स्ट्रेस हार्मोन’ भी कहा जाता है, का स्तर बढ़ जाता है। लंबे समय तक कोर्टिसोल की अधिकता हमारी याददाश्त को कमजोर करती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी पर भी बुरा असर डालती है। यही कारण है कि घंटों एक जगह बैठे रहने के बावजूद लोग खुद को ऊर्जाहीन महसूस करते हैं।
ब्लू लाइट और नींद का बिगड़ता गणित
नींद की गुणवत्ता पर स्क्रीन का प्रभाव सबसे अधिक विनाशकारी है। स्मार्टफोन और लैपटॉप से निकलने वाली ‘ब्लू लाइट’ हमारे शरीर में मेलाटोनिन नामक हार्मोन के उत्पादन को रोक देती है। यह वही हार्मोन है जो शरीर को सोने का संकेत देता है। देर रात तक स्क्रीन देखने से हमारी ‘बॉडी क्लॉक’ भ्रमित हो जाती है, जिससे दिमाग को वह गहरी नींद नहीं मिल पाती जो कोशिकाओं की मरम्मत और ब्रेन रिपेयर के लिए अनिवार्य है। अधूरी नींद अगले दिन की कार्यक्षमता को भी आधा कर देती है।
युवा पीढ़ी और कामकाजी वर्ग पर मंडराता जोखिम
डिजिटल फटीग का सबसे बुरा असर बच्चों और युवाओं पर पड़ रहा है। उनका विकासशील मस्तिष्क इस तीव्र डिजिटल उत्तेजना का आदी होता जा रहा है, जिससे उन्हें वास्तविक दुनिया की गतिविधियां और पढ़ाई उबाऊ लगने लगती है। दूसरी ओर, हाई-स्क्रीन जॉब वाले प्रोफेशनल्स में माइग्रेन, आंखों में सूखापन (Dry Eyes) और गर्दन में दर्द की समस्याएं आम हो गई हैं। वे शारीरिक रूप से तो स्थिर रहते हैं, लेकिन मानसिक रूप से ‘ओवरस्टिम्युलेटेड’ होने के कारण टूट जाते हैं।
बचाव के उपाय: डिजिटल डिटॉक्स की ओर कदम
डॉ. भरानी का सुझाव है कि इस स्थिति से बचने के लिए हमें अपनी आदतों में छोटे लेकिन प्रभावी बदलाव करने होंगे। सोने से कम से कम एक घंटा पहले सभी डिजिटल उपकरणों को खुद से दूर कर दें। काम के दौरान हर 30 से 60 मिनट में एक छोटा ब्रेक लें और आंखों को आराम दें। सोशल मीडिया की स्क्रॉलिंग के बजाय वास्तविक लोगों से संवाद करें और प्रकृति के बीच समय बिताएं। याद रखें, तकनीक हमारे जीवन को आसान बनाने के लिए है, न कि हमें अपना गुलाम बनाने के लिए।



