झारखण्ड

LandPolicy – रांची में भूमिहीनों को हटाकर नहीं बनेगा जनप्रतिनिधियों का आवास

LandPolicy – झारखंड सरकार ने राजधानी रांची में भूमि आवंटन से जुड़े एक अहम मामले पर स्पष्ट रुख अपनाया है। सरकार ने तय किया है कि भूमिहीन परिवारों को हटाकर विधायकों और सांसदों के लिए आवास निर्माण नहीं किया जाएगा। यह निर्णय रांची उपायुक्त की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है, जिसे मानवीय और सामाजिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

ranchi land policy no displacement housing decision

सरकार ने स्पष्ट किया अपना रुख

वित्त और संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने इस संबंध में राज्य के निबंधन और भूमि सुधार विभाग को निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने कहा कि भूमिहीन लोगों के अधिकारों की अनदेखी कर किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य उचित नहीं है।

सरकार का मानना है कि विकास योजनाओं के साथ-साथ सामाजिक संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। इसी सोच के तहत यह निर्णय लिया गया है कि किसी भी परिस्थिति में गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को विस्थापित नहीं किया जाएगा।

वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने के निर्देश

मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि अगले दो महीनों के भीतर रांची शहर के आसपास उपयुक्त जमीन की पहचान कर उसे विधायक-सांसद आवास योजना के लिए उपलब्ध कराया जाए।

इसके अलावा कांके अंचल के मौजा चुटू स्थित 35 एकड़ जमीन, जो पहले आदिवासी परिवारों के नाम पर बंदोबस्त की गई थी, उसे फिर से बहाल करने का भी निर्देश दिया गया है। इस जमीन से जुड़े विवाद को सुलझाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई शुरू करने को कहा गया है।

जिम्मेदार अधिकारियों पर होगी कार्रवाई

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन अधिकारियों की वजह से भूमिहीनों के नाम पर दी गई जमीन का बंदोबस्त रद्द हुआ, उनकी पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में इस तरह की त्रुटियां न हों और जमीन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बनी रहे।

क्या था पूरा मामला

दरअसल, रांची के कांके क्षेत्र में स्थित मौजा चुटू की 35 एकड़ जमीन विधायक और सांसद आवास निर्माण के लिए एक सहकारी समिति को आवंटित की गई थी। इसके लिए समिति की ओर से निर्धारित राशि भी जमा कराई गई थी।

हालांकि, इस जमीन के हस्तांतरण और निबंधन को लेकर विधानसभा में सवाल उठे थे। इसके बाद मामले की स्थिति स्पष्ट करने के लिए उपायुक्त से रिपोर्ट मांगी गई थी।

रिपोर्ट के बाद बदला फैसला

उपायुक्त की रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार ने पूरे मामले की समीक्षा की। समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि भूमिहीनों को हटाकर आवास निर्माण करना न तो उचित है और न ही न्यायसंगत।

सरकार ने इस निर्णय को सामाजिक संवेदनशीलता और न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप बताया है। साथ ही यह भी संकेत दिया गया है कि विकास कार्यों में आम लोगों के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी।

सामाजिक संतुलन पर सरकार का जोर

इस फैसले को राज्य में भूमि नीति और सामाजिक न्याय के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि विकास के नाम पर कमजोर वर्गों के अधिकारों से समझौता नहीं किया जाएगा।

आने वाले समय में यह देखना होगा कि वैकल्पिक भूमि की व्यवस्था कितनी जल्दी होती है और इस परियोजना को किस तरह आगे बढ़ाया जाता है। फिलहाल, सरकार के इस निर्णय से प्रभावित परिवारों को राहत मिली है।

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