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Aravali Protection Crisis: क्या 100 मीटर की नई परिभाषा लील जाएगी हमारी जीवनदायिनी पहाड़ियां…

Aravali Protection Crisis: अरावली पर्वतमाला, जो उत्तर भारत के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती है, आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच हालिया घटनाक्रमों ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि पर्वतमाला की (Environmental Conservation) नई परिभाषा को लेकर गहरे मतभेद उभर कर सामने आए हैं। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित 100 मीटर की ऊंचाई वाली शर्त को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी तो दे दी है, लेकिन इसके पीछे के वैज्ञानिक आधार पर अब भी बड़े सवाल खड़े हैं।

Aravali Protection Crisis
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सुप्रीम कोर्ट और सीईसी के बीच बढ़ता वैचारिक मतभेद

सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2002 में गठित सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने सरकार के इस नए प्रस्ताव पर अपनी असहमति स्पष्ट कर दी है। मंत्रालय ने दावा किया था कि नई परिभाषा को विशेषज्ञों की सहमति प्राप्त है, लेकिन सीईसी ने (Legal Disputes) साफ किया है कि इस परिभाषा की न तो कोई औपचारिक जांच की गई और न ही समिति ने इसे अपनी मंजूरी दी। यह विरोधाभास दर्शाता है कि अरावली जैसे संवेदनशील मुद्दे पर निर्णयों में पारदर्शिता का अभाव है, जो आने वाले समय में घातक सिद्ध हो सकता है।

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट को दरकिनार करने का जोखिम

अरावली की सुरक्षा के लिए वर्ष 2010 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) ने एक विस्तृत सर्वे किया था, जिसमें राजस्थान के 15 जिलों के विशाल क्षेत्र को संरक्षित श्रेणी में रखा गया था। एफएसआई की परिभाषा में (Forest Survey Methodology) केवल ऊंचाई ही नहीं, बल्कि 3 डिग्री के ढलान को भी आधार बनाया गया था, जिससे छोटी पहाड़ियां भी सुरक्षित रहती थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पुरानी और व्यापक परिभाषा को छोड़कर केवल 100 मीटर की ऊंचाई को मानक मानना अरावली की भौगोलिक अखंडता को खंडित करने जैसा है।

खनन माफियाओं के लिए खुल सकते हैं अरावली के द्वार

100 मीटर की इस नई परिभाषा के सबसे खतरनाक परिणाम खनन के रूप में सामने आ सकते हैं। एमिकस क्यूरी के परमेश्वर ने अदालत में यह चेतावनी दी है कि यदि छोटी पहाड़ियों को अरावली के दायरे से बाहर कर दिया गया, तो वे (Mining Regulation Risks) कानूनी तौर पर सुरक्षित नहीं रह पाएंगी। इसका सीधा लाभ खनन माफियाओं को मिलेगा, जो इन निचली पहाड़ियों को समतल कर देंगे, जिससे अरावली की पर्वत श्रृंखला के बीच बड़े अंतराल पैदा हो जाएंगे और पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह चरमरा जाएगा।

थार मरुस्थल के विस्तार का बढ़ता हुआ भयावह खतरा

अरावली पहाड़ियां केवल पत्थर के ढेर नहीं हैं, बल्कि ये थार मरुस्थल को दिल्ली और हरियाणा की ओर बढ़ने से रोकने वाला प्राकृतिक अवरोध हैं। यदि 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को (Desertification Control) संरक्षण के दायरे से हटा दिया गया, तो यह ‘विंड बैरियर’ खत्म हो जाएगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन पहाड़ियों के गायब होने से रेगिस्तानी हवाएं और धूल के गुबार सीधे मैदानी इलाकों में प्रवेश करेंगे, जिससे उत्तर भारत की जलवायु और कृषि पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा।

आंतरिक आकलन और पहाड़ियों के वजूद पर उठते सवाल

हालांकि आधिकारिक तौर पर सरकार बड़े दावे कर रही है, लेकिन एफएसआई के ही एक आंतरिक आकलन ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, यदि 100 मीटर का पैमाना लागू होता है, तो लगभग (Ecological Impact Assessment) 99 प्रतिशत पहाड़ियां अरावली की परिभाषा से बाहर हो सकती हैं। 20 मीटर तक की ऊंचाई वाली पहाड़ियां भी पर्यावरण के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी बड़ी चोटियां, लेकिन नई परिभाषा के तहत इनका अस्तित्व कागजों पर खत्म हो जाएगा।

मंत्रालय के दावों की जमीनी हकीकत और विरोधाभास

पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने तर्क दिया है कि अरावली का बहुत कम हिस्सा खनन के लिए खुला है, लेकिन मंत्रालय यह समझाने में विफल रहा है कि सीमांकन के बिना यह सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। बिना किसी (Ground Demarcation) स्पष्ट सीमांकन के यह कहना कि अरावली सुरक्षित रहेगी, केवल एक कोरी कल्पना लगती है। मंत्रालय के पास इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं है कि भविष्य में उन निचली पहाड़ियों को विकास और निर्माण कार्यों से कैसे बचाया जाएगा जो अब आधिकारिक तौर पर ‘पहाड़’ ही नहीं कहलाएंगे।

पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा बनाम औद्योगिक विकास की होड़

आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां औद्योगिक विकास और प्राकृतिक संरक्षण के बीच का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। अरावली की नई परिभाषा (Sustainable Development Goals) के नाम पर जो बदलाव किए जा रहे हैं, वे अल्पकालिक आर्थिक लाभ तो दे सकते हैं, लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ा पर्यावरणीय संकट छोड़ जाएंगे। समय रहते यदि सीईसी और एफएसआई की मूल सिफारिशों को नहीं माना गया, तो अरावली की ये गूंजती पहाड़ियां केवल इतिहास के पन्नों तक ही सीमित रह जाएंगी

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