CourtObservation – सुप्रीम कोर्ट ने कहा फैसलों की आलोचना करना नागरिकों का अधिकार
CourtObservation – सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि उसके फैसलों की आलोचना करना नागरिकों का अधिकार है और इसे नकारात्मक रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की एक पुरानी किताब में न्यायपालिका से जुड़ी टिप्पणी को हटाने की मांग की गई थी। अदालत ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और कहा कि आलोचना को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए।

पीठ ने आलोचना को बताया स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी न्यायिक फैसले पर अलग-अलग दृष्टिकोण होना स्वाभाविक है। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि अगर कोई पाठ्य सामग्री न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को समझाते हुए कुछ आलोचनात्मक पहलुओं का भी जिक्र करती है, तो उसे गलत नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि न्यायपालिका को आलोचना के प्रति अत्यधिक संवेदनशील नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह संस्थागत मजबूती का हिस्सा है।
किताब में क्या लिखा था, जिस पर उठी आपत्ति
यह मामला कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की एक पुरानी पुस्तक से जुड़ा है, जिसमें न्यायपालिका की भूमिका पर चर्चा करते हुए कुछ फैसलों का उल्लेख किया गया था। याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से उस हिस्से पर आपत्ति जताई थी, जिसमें एक अदालती निर्णय के संदर्भ में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों को शहर में अतिक्रमण करने वाला बताया गया था। इस टिप्पणी को लेकर यह दलील दी गई थी कि इससे न्यायपालिका की छवि प्रभावित हो सकती है और छात्रों के बीच गलत संदेश जा सकता है।
अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण पर दिया जोर
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि संबंधित पाठ्य सामग्री में न्यायपालिका के सकारात्मक कार्यों का भी उल्लेख है। यानी सामग्री केवल आलोचनात्मक नहीं है, बल्कि एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि किसी भी संस्था के बारे में एकतरफा दृष्टिकोण देना उचित नहीं होता, लेकिन अगर अलग-अलग पहलुओं को संतुलित तरीके से रखा गया है, तो उसे हटाने की आवश्यकता नहीं है।
केंद्र सरकार ने समिति गठन की जानकारी दी
इस मामले के समानांतर केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि उसने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका से जुड़े अध्यायों की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस इंदु मल्होत्रा, पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के निदेशक व पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस शामिल हैं। सरकार का कहना है कि यह समिति पाठ्य सामग्री की गुणवत्ता और संतुलन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुझाव देगी।
शिक्षा और अभिव्यक्ति के बीच संतुलन पर चर्चा
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि शैक्षणिक सामग्री में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थाओं के प्रति सम्मान के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि आलोचना को दबाने के बजाय उसे समझना और स्वीकार करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए जरूरी है।