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Delimitation – लोकसभा में बदलते समीकरणों के बीच बढ़ी नए विधेयक की चर्चा

Delimitation – लोकसभा में राजनीतिक समीकरणों के बदलते संकेतों के बीच सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) अपनी संसदीय ताकत बढ़ाने की संभावनाओं को लेकर चर्चा में है। कुछ विपक्षी दलों और सांसदों की बदलती राजनीतिक स्थिति के कारण संसद में संख्या संतुलन पर नए सिरे से गणित लगाया जा रहा है। हालांकि मौजूदा परिस्थितियों में भी संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए आवश्यक दो-तिहाई समर्थन जुटाना आसान नहीं माना जा रहा।

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परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पर नजर

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि आगामी मानसून सत्र के दौरान सरकार परिसीमन से संबंधित संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव को आगे बढ़ाने का प्रयास कर सकती है। इससे पहले पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने के कारण यह पहल आगे नहीं बढ़ सकी थी। अब नए राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच विभिन्न दलों के रुख पर नजर बनी हुई है।

डीएमके की भूमिका पर अटकलें

तमिलनाडु की प्रमुख पार्टी डीएमके को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। राज्य की राजनीति में हाल के बदलावों के बाद पार्टी का राष्ट्रीय विपक्षी खेमे से रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा है। इसी वजह से संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों पर उसके संभावित रुख को लेकर कई तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं। हालांकि पार्टी की ओर से किसी भी समर्थन या रणनीतिक बदलाव को लेकर आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

बदलते घटनाक्रमों से प्रभावित हुआ संख्या बल

हाल के दिनों में कुछ दलों के भीतर उभरे मतभेदों और संभावित राजनीतिक पुनर्संरेखण ने लोकसभा के अंकगणित को चर्चा का विषय बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कुछ सांसद नए गठबंधनों का समर्थन करते हैं तो इससे NDA की संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है। इसके बावजूद संविधान संशोधन के लिए आवश्यक समर्थन तक पहुंचना अभी भी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

विपक्षी दलों की स्थिति पर नजर

संसद में विभिन्न क्षेत्रीय दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बड़े विधायी प्रस्तावों के समय कुछ दलों का रुख निर्णायक साबित हो सकता है। ऐसे में सरकार और विपक्ष दोनों ही सहयोगी तथा तटस्थ दलों के रुख पर नजर बनाए हुए हैं।

लोकसभा सीटों के विस्तार का प्रस्ताव

इस बीच प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़े एक कार्यपत्र में लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन को लेकर एक मॉडल प्रस्तुत किया गया है। प्रस्ताव में मौजूदा 543 सीटों की संख्या बढ़ाकर 824 करने की संभावना पर विचार किया गया है। इसके तहत कई बड़े निर्वाचन क्षेत्रों को छोटे क्षेत्रों में विभाजित कर प्रतिनिधित्व का दायरा बढ़ाने की बात कही गई है।

राज्यों पर पड़ सकता है व्यापक प्रभाव

प्रस्तावित मॉडल के अनुसार देश के विभिन्न राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। दक्षिण भारत के कई राज्यों के साथ-साथ उत्तर और पश्चिम भारत के बड़े राज्यों को भी अतिरिक्त सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है।

उत्तर और दक्षिण के बीच संतुलन पर जोर

कार्यपत्र में यह भी कहा गया है कि प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व अनुपात में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आएगा। इसका उद्देश्य ऐसी संरचना तैयार करना है जिससे जनसंख्या वृद्धि और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व दोनों के बीच संतुलन कायम रखा जा सके। इसी कारण यह प्रस्ताव राजनीतिक और नीति दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

आगे की राजनीतिक दिशा पर निगाहें

फिलहाल परिसीमन और संविधान संशोधन से जुड़े किसी भी प्रस्ताव की सफलता काफी हद तक संसदीय समर्थन पर निर्भर करेगी। आने वाले सत्र में विभिन्न दलों का रुख, संभावित राजनीतिक गठजोड़ और सदन के भीतर संख्या बल यह तय करेगा कि सरकार अपने प्रमुख विधायी एजेंडे को कितनी मजबूती से आगे बढ़ा पाती है।

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