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DelimitationBill – परिसीमन विधेयक पर विशेष सत्र की संभावना, बढ़ी राजनीतिक हलचल

DelimitationBill – केंद्र सरकार संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 को आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रही है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, यदि आवश्यक समर्थन सुनिश्चित हो जाता है तो सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाकर प्रस्तावित परिसीमन विधेयक को पारित कराने की दिशा में कदम बढ़ा सकती है। यह चर्चा ऐसे समय में सामने आई है जब संसद का आगामी मॉनसून सत्र भी निकट है और राजनीतिक दलों के बीच इस विषय पर संवाद तेज हो रहा है।

delimitation bill special session plan

सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन सत्ता पक्ष से जुड़े सूत्रों का कहना है कि विभिन्न दलों के रुख का आकलन किया जा रहा है ताकि विधेयक को लेकर व्यापक सहमति बनाई जा सके।

विशेष सत्र को लेकर संकेत

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भाजपा से जुड़े वरिष्ठ नेताओं ने संकेत दिए हैं कि यदि संसद में आवश्यक समर्थन का आंकड़ा हासिल हो जाता है तो विशेष सत्र बुलाने का विकल्प अपनाया जा सकता है। सूत्रों का कहना है कि सरकार इस मुद्दे को राष्ट्रीय महत्व का विषय मानते हुए सभी पक्षों से संवाद बनाए हुए है।

बताया जा रहा है कि विपक्ष की ओर से कुछ सुझाव आने की स्थिति में उन पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि, सरकार का जोर इस बात पर है कि परिसीमन से जुड़ी प्रक्रिया मौजूदा संवैधानिक और कानूनी ढांचे के अनुरूप ही आगे बढ़े।

मौजूदा कानून में बदलाव की अटकलों पर सफाई

सरकारी सूत्रों ने उन चर्चाओं को खारिज किया है जिनमें परिसीमन से संबंधित मौजूदा कानूनों में बड़े बदलाव की संभावना जताई जा रही थी। उनका कहना है कि प्रस्तावित प्रक्रिया का उद्देश्य वर्तमान व्यवस्था को पूरी तरह बदलना नहीं है, बल्कि भविष्य की जनसंख्या और प्रतिनिधित्व संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप संसदीय ढांचे को तैयार करना है।

सूत्रों के मुताबिक, परिसीमन आयोग से जुड़े मौजूदा कानूनी प्रावधान यथावत रखे जाने की बात कही जा रही है। सरकार का दावा है कि इस विषय को लेकर कई तरह की भ्रामक जानकारियां भी प्रसारित की जा रही हैं, जबकि प्रस्तावित ढांचे का उद्देश्य प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाना है।

सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव

जानकारी के अनुसार, प्रस्तावित मॉडल में लोकसभा सीटों की संख्या में समानुपातिक वृद्धि का विचार शामिल है। सूत्रों का कहना है कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच वर्तमान प्रतिनिधित्व संतुलन को बनाए रखते हुए सीटों में समान प्रतिशत की वृद्धि का विकल्प देखा जा रहा है।

यदि इस सिद्धांत को लागू किया जाता है, तो वर्तमान 543 लोकसभा सीटों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकती है। इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए लोकसभा की अधिकतम सीट सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव भी चर्चा में है। इससे भविष्य में बढ़ती जनसंख्या और प्रतिनिधित्व की जरूरतों को समायोजित करने में मदद मिल सकती है।

राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर आश्वासन

परिसीमन को लेकर लंबे समय से यह चिंता व्यक्त की जाती रही है कि कुछ राज्यों के प्रतिनिधित्व पर इसका असर पड़ सकता है। खासकर दक्षिण भारत और अपेक्षाकृत छोटे राज्यों को लेकर राजनीतिक बहस समय-समय पर सामने आती रही है।

हालांकि, सरकारी सूत्रों का कहना है कि प्रस्तावित व्यवस्था में किसी राज्य की हिस्सेदारी कम करने का उद्देश्य नहीं है। उनका दावा है कि सीटों में समानुपातिक विस्तार की नीति अपनाने से वर्तमान संतुलन को बनाए रखने का प्रयास किया जाएगा और किसी क्षेत्र के साथ असमान व्यवहार नहीं होगा।

संसद में बहुमत जुटाना बड़ी चुनौती

संविधान संशोधन से जुड़े किसी भी विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में विशेष बहुमत आवश्यक होता है। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त समर्थन जुटाने की है। मौजूदा संसदीय गणित को देखते हुए सत्ता पक्ष को कुछ अन्य दलों का सहयोग भी चाहिए होगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसी वजह से सरकार विभिन्न दलों के साथ संवाद और सहमति निर्माण की प्रक्रिया पर विशेष ध्यान दे रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है, क्योंकि यह देश की संसदीय संरचना से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय माना जा रहा है।

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