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HighCourt – आपराधिक मामले में बरी होने पर नौकरी बहाली जरूरी नहीं…

HighCourt – आपराधिक मामलों में बरी होने के बाद सरकारी नौकरी वापस मिलने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम स्पष्टता दी है। कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा कि केवल इस आधार पर कि कोई कर्मचारी आपराधिक मुकदमे में बरी हो गया है, उसे स्वतः सेवा में बहाल नहीं किया जा सकता। न्यायालय के अनुसार, यदि विभागीय जांच में आरोप प्रमाणित हो चुके हैं, तो उस कार्रवाई को बरकरार रखा जा सकता है, भले ही आपराधिक अदालत से राहत मिल गई हो।

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अपराधिक और विभागीय कार्यवाही अलग-अलग दायरे में

न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमा और विभागीय जांच एक ही घटना से जुड़े होने के बावजूद अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। दोनों के मानक और साक्ष्य का मूल्यांकन भी अलग तरीके से किया जाता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय जांच में “संभावनाओं के आधार” पर निर्णय लिया जाता है, जबकि आपराधिक मामलों में आरोप सिद्ध करने के लिए ठोस और संदेह से परे प्रमाण आवश्यक होते हैं।

सम्मानपूर्वक बरी होने की स्थिति में अलग हो सकता है फैसला

अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी मामले में आरोप, गवाह और साक्ष्य दोनों कार्यवाहियों में पूरी तरह समान हों और आरोपी को ‘सम्मानपूर्वक बरी’ किया गया हो, तो परिस्थिति अलग हो सकती है। ऐसी स्थिति में विभागीय कार्रवाई पर पुनर्विचार संभव है। लेकिन यदि बरी होना केवल गवाहों के मुकर जाने या संदेह का लाभ मिलने के कारण हुआ है, तो इसका विभागीय कार्रवाई पर कोई स्वतः प्रभाव नहीं पड़ता।

मामले की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

यह मामला फिरोजाबाद जिले में तैनात एक पुलिस कांस्टेबल कुंवर पाल सिंह से जुड़ा है। ड्यूटी के दौरान उसे एक बंदी को अदालत में पेश करने की जिम्मेदारी दी गई थी। आरोप है कि इस दौरान वह अत्यधिक शराब के नशे में था और उसकी सरकारी राइफल से गोली चल गई, जिससे दो लोग घायल हो गए। इस घटना के बाद उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 307 के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज किया गया, साथ ही विभागीय जांच भी शुरू की गई।

विभागीय जांच में सामने आए ठोस साक्ष्य

जांच के दौरान मेडिकल रिपोर्ट में यह पुष्टि हुई कि घटना के समय संबंधित कांस्टेबल शराब के प्रभाव में था। विभागीय स्तर पर उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि उसकी लापरवाही के कारण ही गोली चली। इसके आधार पर विभाग ने उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की, जिसे बाद में अपीलीय और पुनरीक्षण स्तर पर भी बरकरार रखा गया।

गवाहों के मुकरने से मिला आपराधिक मुकदमे में लाभ

दूसरी ओर, आपराधिक मुकदमे की सुनवाई के दौरान मुख्य गवाह अपने बयानों से पीछे हट गए। इसके चलते अभियोजन पक्ष कमजोर पड़ गया और अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए आरोपी को बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि यह ‘क्लीन एक्विटल’ का मामला नहीं है, बल्कि तकनीकी आधार पर मिली राहत है।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर बरकरार रखा निर्णय

इन सभी तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने यह साफ किया कि विभागीय जांच में मौजूद साक्ष्य अधिक विश्वसनीय और व्यापक थे। अदालत ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी और पुनरीक्षण प्राधिकारी के फैसलों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता की सेवा बहाली की मांग को खारिज कर दिया गया।

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