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India Higher Education: मोदी सरकार ने UGC समेत तीन बड़े निकाय खत्म किए, सिंगल रेगुलेटर के आने से होंगे 5 सबसे बड़े फायदे

India Higher Education: भारत के हायर एजुकेशन सिस्टम में एक बड़ा और दूरगामी बदलाव होने जा रहा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शुक्रवार को उस विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई जैसे अलग-अलग नियामक निकायों की जगह एक नया एकीकृत उच्च शिक्षा नियामक स्थापित किया जाएगा। पहले इसे भारत का उच्च शिक्षा आयोग (HECI) विधेयक कहा जा रहा था, लेकिन अब इसका नाम बदलकर विकसित भारत शिक्षा अधीक्षण विधेयक कर दिया गया है। यह कदम नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विजन को जमीन पर उतारने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

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यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई की भूमिका होगी समाप्त

अब तक देश में उच्च शिक्षा के अलग-अलग क्षेत्रों की निगरानी अलग-अलग संस्थाएं करती थीं। यूजीसी गैर-तकनीकी उच्च शिक्षा की देखरेख करती थी, एआईसीटीई तकनीकी शिक्षा के लिए जिम्मेदार थी और एनसीटीई शिक्षकों (UGC AICTE NCTE) की शिक्षा को नियंत्रित करती थी। लेकिन नई व्यवस्था के लागू होने के बाद इन सभी की जगह एक सिंगल रेगुलेटरी फ्रेमवर्क काम करेगा। सरकार का मानना है कि इससे नियामकीय जटिलताएं कम होंगी और शिक्षा व्यवस्था ज्यादा प्रभावी बनेगी।

मेडिकल और लॉ कॉलेज रहेंगे दायरे से बाहर

हालांकि यह नया उच्च शिक्षा नियामक (Single Education Regulator) व्यापक होगा, लेकिन मेडिकल और लॉ कॉलेज इसके दायरे में शामिल नहीं किए जाएंगे। इन क्षेत्रों के लिए पहले से मौजूद विशेष नियामक संस्थाएं ही काम करती रहेंगी। प्रस्तावित आयोग को मुख्य रूप से विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए एकल नियामक के रूप में विकसित किया जाएगा, जिससे शिक्षा के मानकों में एकरूपता लाई जा सके।

तीन प्रमुख जिम्मेदारियों पर होगा फोकस

नए नियामक निकाय की तीन मुख्य जिम्मेदारियां तय की गई हैं। पहली, उच्च शिक्षा संस्थानों (Education Regulation) का विनियमन यानी रेगुलेशन। दूसरी, गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए मान्यता या एक्रीडिएशन। और तीसरी, व्यावसायिक एवं शैक्षणिक मानकों का निर्धारण। फिलहाल फंडिंग को सीधे नियामक के अधीन नहीं रखा गया है, हालांकि इससे जुड़ी व्यवस्था अलग प्रभाग के तहत संचालित होगी।

चार वर्टिकल्स में बंटेगा पूरा सिस्टम

विकसित भारत शिक्षा अधीक्षण के अंतर्गत चार अलग-अलग वर्टिकल्स या प्रभाग बनाए जाएंगे। पहला होगा राष्ट्रीय उच्च शिक्षा विनियामक परिषद, जो मेडिकल और लॉ को छोड़कर सभी क्षेत्रों का नियमन करेगी। दूसरा, राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (HECI Structure) होगी, जो संस्थानों की गुणवत्ता जांचेगी। तीसरा, सामान्य शिक्षा परिषद होगी, जो शिक्षण के मानक और पाठ्यक्रम से जुड़े दिशा-निर्देश तय करेगी। चौथा, उच्च शिक्षा अनुदान परिषद होगी, जो फंडिंग से जुड़े मामलों को देखेगी।

गवर्नेंस होगी आसान और पारदर्शी

सरकारी अधिकारियों (Education Governance) के अनुसार इस नए फ्रेमवर्क से उच्च शिक्षा की गवर्नेंस पहले से कहीं ज्यादा सरल और पारदर्शी होगी। अलग-अलग नियामक संस्थाओं के बीच होने वाला ओवरलैप खत्म होगा और निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी। सरकारी और निजी संस्थानों दोनों में शैक्षणिक गुणवत्ता और सीखने के नतीजों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा। इससे छात्रों को बेहतर शिक्षा अनुभव मिलने की उम्मीद है।

हितों के टकराव और माइक्रोमैनेजमेंट पर लगेगी रोक

शिक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस संरचनात्मक विभाजन (Transparent Framework) का मकसद हितों के टकराव को रोकना और माइक्रोमैनेजमेंट को कम करना है। अभी तक एक ही संस्था के पास कई शक्तियां केंद्रित थीं, जिससे पारदर्शिता प्रभावित होती थी। नए कानून के तहत रेगुलेशन, एक्रीडिएशन, मानक निर्धारण और फंडिंग को अलग-अलग प्रभागों में बांटा जाएगा, जिससे जवाबदेही भी तय होगी।

विश्वविद्यालयों को मिलेगी ज्यादा स्वतंत्रता

इस विधेयक के समर्थकों का मानना है कि यह बदलाव विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को अधिक अकादमिक स्वतंत्रता (Academic Freedom) देगा। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर विनय पाठक के अनुसार, एकल नियामक से शैक्षणिक मानकों में सामंजस्य आएगा और सभी संस्थानों के लिए समान गुणवत्ता मानक तय किए जा सकेंगे। इससे पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति और शोध में नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।

लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक खामियों का समाधान

उच्च शिक्षा क्षेत्र (Education Policy) में लंबे समय से यह शिकायत रही है कि कई नियामक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र आपस में टकराते हैं। इससे विरोधाभासी नियम बनते हैं और मंजूरी की प्रक्रिया में देरी होती है। नया विधेयक इन समस्याओं को दूर करने की कोशिश करता है। एक सिंगल रेगुलेटर के तहत नियमों की स्पष्टता बढ़ेगी और संस्थानों को बार-बार अलग-अलग दरवाजों पर नहीं जाना पड़ेगा।

विकसित भारत के लक्ष्य से जुड़ा शिक्षा सुधार

सरकार इस विधेयक को विकसित भारत के लक्ष्य (Viksit Bharat Vision) से जोड़कर देख रही है। उच्च शिक्षा को अधिक गुणवत्तापूर्ण, जवाबदेह और वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाना इसका मुख्य उद्देश्य है। यदि यह मॉडल सफल रहा, तो भारतीय विश्वविद्यालयों की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग और रिसर्च आउटपुट में भी सुधार देखने को मिल सकता है। आने वाले समय में यह सुधार देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा और दशा दोनों बदल सकता है।

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