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LegalUpdate – बहू पर सास-ससुर के भरण-पोषण की बाध्यता नहीं: हाई कोर्ट

LegalUpdate – इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पारिवारिक जिम्मेदारियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि बहू पर अपने सास-ससुर का भरण-पोषण करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। अदालत ने कहा कि भले ही भारतीय समाज में इसे नैतिक कर्तव्य के रूप में देखा जाता रहा हो, लेकिन कानून के दायरे में इसे अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। यह फैसला उन मामलों के संदर्भ में अहम माना जा रहा है, जहां बुजुर्ग माता-पिता अपने बेटे के निधन के बाद बहू से आर्थिक सहायता की अपेक्षा करते हैं।

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नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी में अंतर स्पष्ट
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा कि नैतिक दायित्व और कानूनी बाध्यता दो अलग-अलग बातें हैं। अदालत के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को केवल सामाजिक या पारिवारिक अपेक्षाओं के आधार पर कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित कानूनों में सास-ससुर को बहू के भरण-पोषण के दायरे में शामिल नहीं किया गया है, जिससे विधायिका की मंशा साफ होती है।

कानून में क्या कहता है प्रावधान
फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 144 के तहत जिन रिश्तों को भरण-पोषण का अधिकार दिया गया है, उनमें सास-ससुर शामिल नहीं हैं। इसका अर्थ यह है कि किसी बहू को अदालत के आदेश से अपने सास-ससुर का खर्च उठाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि कानून में इस तरह का प्रावधान नहीं है, तो न्यायालय इसे अपनी व्याख्या से जोड़ नहीं सकता।

आगरा से जुड़े मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला आगरा के एक बुजुर्ग दंपत्ति से जुड़ा है, जिन्होंने अपने बेटे के निधन के बाद बहू से गुजारा भत्ता देने की मांग की थी। दंपत्ति ने अदालत में दलील दी कि उनकी बहू सरकारी नौकरी में है और उसकी आय पर्याप्त है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि बेटे की मृत्यु के बाद उससे जुड़े लाभ भी बहू को ही मिले हैं, ऐसे में उन्हें आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए।

फैमिली कोर्ट से हाई कोर्ट तक का सफर
आगरा की फैमिली कोर्ट ने अगस्त 2025 में इस याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद दंपत्ति ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील दायर की। अपील में उन्होंने तर्क दिया कि बहू की नैतिक जिम्मेदारी को कानूनी रूप दिया जाना चाहिए, लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

संपत्ति और भरण-पोषण अलग मुद्दे
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मृत बेटे की संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़े मामलों को भरण-पोषण के दावे के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। यानी यदि संपत्ति को लेकर कोई विवाद है, तो उसे अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत ही सुलझाया जाएगा। इस मामले में केवल भरण-पोषण की जिम्मेदारी पर विचार किया गया, जिसमें बहू को बाध्य नहीं माना गया।

फैसले का व्यापक असर
यह निर्णय उन परिवारों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मार्गदर्शन प्रदान करता है, जहां इस तरह के विवाद सामने आते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि पारिवारिक और सामाजिक अपेक्षाएं अपनी जगह हैं, लेकिन कानून केवल उन्हीं जिम्मेदारियों को लागू करता है, जिन्हें विधायिका ने स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है।

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