LTTE – प्रभाकरन की विरासत पर फिर तेज हुई तमिल राजनीति बहस
LTTE – तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर श्रीलंका के गृहयुद्ध और लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन का नाम चर्चा में है। हाल ही में मुख्यमंत्री विजय ने मुल्लीवैक्काल दिवस पर ईलम तमिलों के अधिकारों को लेकर बयान जारी किया, जिसके बाद पुराने राजनीतिक और भावनात्मक सवाल फिर सामने आ गए। 18 मई की तारीख श्रीलंका के इतिहास में बेहद अहम मानी जाती है, क्योंकि इसी दिन वर्ष 2009 में लंबे गृहयुद्ध का अंत हुआ था और लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन मारा गया था।

भारत में प्रभाकरन का नाम अक्सर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या से जुड़ा हुआ माना जाता है। इसके बावजूद तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में आज भी उसे तमिल समुदाय की आवाज उठाने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। यही वजह है कि हर साल मुल्लीवैक्काल दिवस के आसपास यह मुद्दा फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का केंद्र बन जाता है।
तमिल अलगाववादी आंदोलन से उभरा लिट्टे
वेलुपिल्लई प्रभाकरन ने 1970 के दशक में श्रीलंका में तमिल समुदाय के अधिकारों की मांग को लेकर लिट्टे संगठन की स्थापना की थी। उस समय श्रीलंका में सिंहली और तमिल समुदायों के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा था। प्रभाकरन का उद्देश्य देश के उत्तरी और पूर्वी इलाकों में तमिलों के लिए अलग राष्ट्र ‘तमिल ईलम’ बनाना था।
धीरे-धीरे लिट्टे दक्षिण एशिया के सबसे संगठित उग्रवादी संगठनों में शामिल हो गया। संगठन के पास समुद्री और हवाई क्षमताएं भी थीं, जिसने इसे दूसरे विद्रोही समूहों से अलग पहचान दी। श्रीलंका सरकार और लिट्टे के बीच कई वर्षों तक हिंसक संघर्ष चलता रहा, जिसमें हजारों लोगों की जान गई।
राजीव गांधी हत्या ने बदली भारत की धारणा
भारत और लिट्टे के संबंधों में बड़ा बदलाव उस समय आया जब 1987 में भारत-श्रीलंका समझौते के बाद भारतीय शांति सेना को श्रीलंका भेजा गया। शुरुआत में यह मिशन शांति बहाली के लिए था, लेकिन बाद में भारतीय सेना और लिट्टे के बीच संघर्ष शुरू हो गया। इस दौरान दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में चुनाव प्रचार के दौरान आत्मघाती हमले में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। जांच एजेंसियों ने इस हमले के पीछे लिट्टे और उसके शीर्ष नेतृत्व की भूमिका बताई थी। इस घटना के बाद भारत में लिट्टे को लेकर कड़ा रुख अपनाया गया और संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
2009 में खत्म हुआ लंबा गृहयुद्ध
करीब 26 वर्षों तक चले संघर्ष के बाद श्रीलंकाई सेना ने 2009 में लिट्टे के खिलाफ अंतिम सैन्य अभियान चलाया। सेना ने उत्तरी क्षेत्र में संगठन को चारों ओर से घेर लिया था। इसी दौरान मुल्लीवैक्काल और नंदीकदल इलाके में भीषण लड़ाई हुई, जिसमें प्रभाकरन के मारे जाने की पुष्टि की गई।
श्रीलंका सरकार ने बाद में डीएनए जांच के जरिए उसकी मौत की आधिकारिक जानकारी दी। इसके साथ ही देश में लंबे समय से चल रहा गृहयुद्ध समाप्त हो गया। हालांकि युद्ध के अंतिम दिनों में नागरिकों की मौत और मानवाधिकार मुद्दों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल भी उठे थे।
तमिलनाडु में क्यों कायम है सहानुभूति
राजीव गांधी हत्या की घटना के बावजूद तमिलनाडु के कुछ राजनीतिक और सामाजिक समूहों में प्रभाकरन को लेकर अलग नजरिया देखने को मिलता है। इसकी बड़ी वजह श्रीलंका के तमिलों के साथ सांस्कृतिक और भाषाई जुड़ाव माना जाता है। तमिल समाज का एक वर्ग मानता है कि गृहयुद्ध के दौरान तमिल समुदाय ने गंभीर मुश्किलों का सामना किया और प्रभाकरन ने उनके अधिकारों की आवाज उठाई।
राज्य की राजनीति में भी तमिल पहचान और तमिल समुदाय से जुड़े मुद्दे लंबे समय से अहम रहे हैं। ऐसे में ईलम तमिलों के समर्थन को कई नेता सामाजिक संवेदनाओं से जुड़ा विषय मानते हैं। यही कारण है कि समय-समय पर इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बयान और प्रतिक्रियाएं सामने आती रहती हैं।