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NCPI – बागी सांसदों के फैसले से अचानक चर्चा में आई पार्टी

NCPI – पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की राजनीति में अब तक सीमित पहचान रखने वाली नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) इन दिनों राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में आ गई है। इसकी वजह तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों का वह फैसला है, जिसमें उन्होंने इस दल के साथ जुड़ने का रास्ता चुना है। लंबे समय तक अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहने वाली यह पार्टी अचानक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम का हिस्सा बन गई है।

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चुनाव आयोग में पंजीकृत है पार्टी

एनसीपीआई भारतीय चुनाव आयोग के साथ विधिवत पंजीकृत राजनीतिक दल है। हालांकि इसे अभी तक राज्य या राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है। इसका वर्तमान दर्जा पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का है। इसका अर्थ यह है कि पार्टी कानूनी रूप से चुनावी प्रक्रिया में भाग ले सकती है, लेकिन उसे मान्यता प्राप्त दलों जैसी विशेष सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

कानूनी स्थिति ने बढ़ाई अहमियत

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हालिया घटनाक्रम में पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसका कानूनी अस्तित्व है। किसी पंजीकृत राजनीतिक दल के साथ जुड़ाव कुछ परिस्थितियों में संसदीय और राजनीतिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है। यही कारण है कि अचानक इस पार्टी का नाम राष्ट्रीय राजनीति में प्रमुखता से लिया जाने लगा है।

हावड़ा में मुख्यालय, त्रिपुरा में सक्रियता

चुनाव आयोग के उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार पार्टी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के सांकराइल क्षेत्र में स्थित है। हालांकि इसके अधिकांश राजनीतिक प्रयास और चुनावी गतिविधियां त्रिपुरा में केंद्रित रही हैं। समय-समय पर पार्टी ने वहां विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार उतारे हैं और स्थानीय मुद्दों को उठाने का प्रयास किया है।

चुनावी प्रदर्शन रहा सीमित

वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में एनसीपीआई ने कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। हालांकि पार्टी को चुनावी सफलता नहीं मिली। इसके अलावा असम के कुछ क्षेत्रों में भी उसने बंगाली भाषी समुदाय से जुड़े मुद्दों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश की थी। बावजूद इसके, पार्टी अब तक व्यापक जनाधार बनाने में सफल नहीं हो सकी है।

स्थायी चुनाव चिह्न नहीं है उपलब्ध

एनसीपीआई की एक विशेषता यह भी है कि उसके पास कोई स्थायी चुनाव चिह्न नहीं है। भारतीय चुनाव व्यवस्था में केवल मान्यता प्राप्त दलों को आरक्षित चुनाव चिह्न दिए जाते हैं। चूंकि यह पार्टी गैर-मान्यता प्राप्त श्रेणी में आती है, इसलिए हर चुनाव में उसे चुनाव आयोग द्वारा उपलब्ध कराए गए मुक्त चुनाव चिह्नों में से किसी एक का चयन करना पड़ता है।

बागी सांसदों के आने से बदल सकती है तस्वीर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों के जुड़ने के बाद पार्टी की राजनीतिक भूमिका और प्रभाव में बदलाव आ सकता है। अब तक सीमित स्तर पर सक्रिय रही एनसीपीआई को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने लगी है। वरिष्ठ सांसदों और अनुभवी नेताओं की मौजूदगी से संगठनात्मक ढांचे में भी परिवर्तन देखने को मिल सकता है।

मान्यता प्राप्त करने के लिए पूरी करनी होंगी शर्तें

चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार किसी राजनीतिक दल को मान्यता प्राप्त करने के लिए निर्धारित मत प्रतिशत या सीटों की संख्या हासिल करनी होती है। फिलहाल एनसीपीआई इन मानकों को पूरा नहीं कर सकी है। इसलिए उसका दर्जा पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल का ही बना हुआ है। हालांकि हाल की राजनीतिक हलचल ने यह जरूर दिखाया है कि कभी-कभी छोटे दल भी राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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