Pipeline – ओमान से भारत तक समुद्र के नीचे गैस परियोजना की तैयारी
Pipeline – ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत अब खाड़ी क्षेत्र से सीधे प्राकृतिक गैस लाने की बड़ी योजना पर तेजी से काम कर रहा है। सरकार समुद्र के भीतर एक लंबी गैस पाइपलाइन बिछाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जो ओमान को सीधे गुजरात तट से जोड़ सकती है। इस परियोजना को भारत की भविष्य की ऊर्जा जरूरतों और आयात सुरक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

पेट्रोलियम मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, प्रस्तावित मिडल ईस्ट-इंडिया डीप-वाटर पाइपलाइन की अनुमानित लागत करीब 40 हजार करोड़ रुपये आंकी गई है। यदि सभी मंजूरियां समय पर मिलती हैं तो निर्माण कार्य पूरा होने में पांच से सात वर्ष लग सकते हैं।
समुद्र की गहराई में बिछेगी पाइपलाइन
प्रस्तावित पाइपलाइन लगभग 2,000 किलोमीटर लंबी होगी और अरब सागर के भीतर से होकर गुजरेगी। बताया जा रहा है कि इसका कुछ हिस्सा समुद्र की 3,450 मीटर तक की गहराई में बिछाया जा सकता है। इस वजह से यह दुनिया की सबसे गहरी समुद्री गैस पाइपलाइन परियोजनाओं में शामिल हो सकती है।
परियोजना के जरिए प्रतिदिन करीब 31 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस भारत तक पहुंचाने की क्षमता विकसित करने की योजना है। इससे देश में गैस आधारित उद्योगों और बिजली उत्पादन को स्थिर आपूर्ति मिल सकती है।
बढ़ती मांग ने बढ़ाई चिंता
भारत में प्राकृतिक गैस की खपत लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में देश की दैनिक मांग 190 से 195 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर के बीच है, जबकि अगले कुछ वर्षों में इसके 300 मिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों और स्वच्छ ईंधन की ओर झुकाव के कारण गैस की आवश्यकता और बढ़ेगी।
हाल के महीनों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में पैदा हुए तनाव ने भी भारत की चिंता बढ़ाई है। इस समुद्री मार्ग से बड़ी मात्रा में एलएनजी आपूर्ति होती है। क्षेत्रीय तनाव के कारण वैश्विक गैस आपूर्ति प्रभावित हुई और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला। सामान्य परिस्थितियों में अपेक्षाकृत कम कीमत पर मिलने वाली गैस संकट के दौरान दोगुने से अधिक दाम पर पहुंच गई।
समुद्री मार्ग पर निर्भरता कम करने की कोशिश
ऊर्जा क्षेत्र के अधिकारियों का मानना है कि यदि भारत के पास सीधी पाइपलाइन कनेक्टिविटी होगी तो वह स्पॉट मार्केट और समुद्री अवरोधों पर कम निर्भर रहेगा। इससे लंबी अवधि में गैस आपूर्ति अधिक स्थिर और लागत नियंत्रित रह सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान में भारत के पास सीमित गैस भंडारण क्षमता है, जो केवल कुछ दिनों की जरूरत पूरी कर सकती है। इसके विपरीत चीन ने बीते वर्षों में रूस और मध्य एशिया से कई स्थलीय पाइपलाइन नेटवर्क विकसित किए हैं, जिससे उसकी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई है।
सरकारी कंपनियों को मिल सकता है जिम्मा
सूत्रों के अनुसार, पेट्रोलियम मंत्रालय जल्द ही इस परियोजना पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार कराने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। इसके लिए GAIL, Engineers India Limited और Indian Oil जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को तकनीकी और आर्थिक अध्ययन का जिम्मा दिया जा सकता है।
यह योजना साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज की प्रारंभिक अध्ययन रिपोर्ट पर आधारित बताई जा रही है। कंपनी ने पहले समुद्री तल की स्थिति और तकनीकी व्यवहार्यता का परीक्षण भी किया था। नई समुद्री इंजीनियरिंग तकनीकों के कारण अब गहरे समुद्र में पाइपलाइन बिछाना पहले की तुलना में अधिक संभव माना जा रहा है।
खाड़ी देशों से सीधा संपर्क संभव
इस परियोजना के जरिए भविष्य में भारत को केवल ओमान ही नहीं बल्कि संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब और अन्य गैस उत्पादक देशों से भी सीधे ऊर्जा आपूर्ति का विकल्प मिल सकता है। ऊर्जा विश्लेषकों का कहना है कि इससे भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति को मजबूती मिलेगी और आयात ढांचे में विविधता आएगी।