PoliticalShift – सात सांसदों की वापसी पर राष्ट्रपति से मिलेंगे भगवंत मान
PoliticalShift – आम आदमी पार्टी से भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए सात राज्यसभा सांसदों को लेकर पंजाब की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने संकेत दिया है कि वह जल्द ही दिल्ली जाकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात करेंगे। इस प्रस्तावित मुलाकात का उद्देश्य उन सांसदों की वापसी को लेकर संवैधानिक विकल्पों पर चर्चा करना बताया जा रहा है, जिन्होंने हाल ही में पार्टी बदली है।

राष्ट्रपति से मुलाकात की तैयारी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भगवंत मान अगले सप्ताह राष्ट्रपति से मिलने का कार्यक्रम बना रहे हैं। इस दौरान वह उन सात सांसदों के मुद्दे को प्रमुखता से उठाएंगे, जो आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा के साथ जुड़ गए हैं। मुख्यमंत्री इस मामले में ऐसे प्रावधानों की तलाश में हैं, जिनसे इन प्रतिनिधियों को दोबारा पार्टी में लाने की प्रक्रिया संभव हो सके।
पुराने बयान का सहारा
दिलचस्प बात यह है कि भगवंत मान इस मुद्दे को उठाने के लिए अपने ही दल के नेता राघव चड्ढा के पूर्व बयान का हवाला दे रहे हैं। राघव चड्ढा ने इसी वर्ष राज्यसभा में ‘राइट टू रिकॉल’ यानी जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार की वकालत की थी। उनका कहना था कि यदि जनता किसी नेता को चुन सकती है, तो उसे हटाने का अधिकार भी होना चाहिए।
राज्यसभा में उठी थी मांग
राघव चड्ढा ने राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के उपनेता के रूप में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया था। उन्होंने कहा था कि मौजूदा व्यवस्था में मतदाताओं के पास अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को उनके कार्यकाल के दौरान वापस बुलाने का कोई स्पष्ट अधिकार नहीं है। उनका तर्क था कि लोकतंत्र को और जवाबदेह बनाने के लिए इस तरह की व्यवस्था जरूरी है।
‘राइट टू रिकॉल’ पर जोर
उन्होंने अपने संबोधन में कहा था कि तेज़ी से बदलते समय में पांच साल का कार्यकाल कई बार लंबा साबित होता है। यदि कोई प्रतिनिधि अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता, तो मतदाताओं को बीच कार्यकाल में ही उसे हटाने का विकल्प मिलना चाहिए। चड्ढा ने इसे लोकतंत्र को मजबूत करने वाला कदम बताते हुए कहा था कि इससे जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही बढ़ेगी।
लोकतंत्र में जवाबदेही का सवाल
राघव चड्ढा ने चुनावी प्रक्रिया की एक महत्वपूर्ण चुनौती की ओर भी ध्यान दिलाया था। उन्होंने कहा था कि चुनाव से पहले नेता जनता के पास जाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद स्थिति उलट जाती है। इस अंतर को खत्म करने के लिए ‘राइट टू रिकॉल’ जैसे प्रावधान उपयोगी हो सकते हैं, जिससे जनता को अपने फैसलों को सुधारने का अवसर मिल सके।
राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज
भगवंत मान के इस कदम ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। एक ओर जहां इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के विस्तार की दिशा में प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके व्यावहारिक पहलुओं और संवैधानिक सीमाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि राष्ट्रपति से होने वाली मुलाकात के बाद इस मुद्दे पर क्या दिशा तय होती है।