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RajyaSabhaElection – कर्नाटक में मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर कांग्रेस पर बढ़ा दबाव

RajyaSabhaElection – कर्नाटक में राज्यसभा चुनाव की तैयारियों के बीच सियासी हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। राज्य के कई मुस्लिम संगठनों के साझा मंच फेडरेशन ऑफ स्टेट मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशन्स ने कांग्रेस नेतृत्व से मांग की है कि आगामी राज्यसभा चुनाव में पार्टी कम से कम एक सीट मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवार को दे। संगठन का कहना है कि राज्य में कांग्रेस की मजबूत स्थिति को देखते हुए यह फैसला समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करने की दिशा में अहम कदम हो सकता है।

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राज्यसभा चुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक हलचल

कर्नाटक से राज्यसभा की चार सीटों के लिए 18 जून को मतदान होना है। विधानसभा में मौजूदा संख्या बल के आधार पर कांग्रेस तीन सीटें जीतने की मजबूत स्थिति में मानी जा रही है, जबकि एक सीट भाजपा नीत एनडीए गठबंधन के खाते में जाती दिख रही है। ऐसे में उम्मीदवारों के चयन को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर दोनों स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।

इन सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 25 जून को समाप्त हो रहा है। रिटायर होने वाले सांसदों में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा, भाजपा सांसद इरण कडाडी और नारायण कोरा गप्पा शामिल हैं। इसी पृष्ठभूमि में मुस्लिम संगठनों की यह मांग राजनीतिक महत्व रखती है।

कांग्रेस नेतृत्व से सीधे हस्तक्षेप की अपील

फेडरेशन ने अपने बयान में कहा है कि कांग्रेस के पास इस बार तीन सीटें जीतने का स्पष्ट अवसर है, इसलिए पार्टी को उनमें से एक सीट मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि को देनी चाहिए। संगठन ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार से व्यक्तिगत स्तर पर हस्तक्षेप करने की अपील की है।

संगठन का कहना है कि राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी लगातार कम होती जा रही है। उनका दावा है कि संसद में कर्नाटक से मुस्लिम प्रतिनिधित्व अब बेहद सीमित रह गया है, जिसे लेकर समुदाय के भीतर चिंता बढ़ रही है।

संसद में घटते प्रतिनिधित्व पर चिंता

महासंघ ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि कर्नाटक से राज्यसभा के वर्तमान 12 सदस्यों में केवल एक सदस्य मुस्लिम समुदाय से आता है। संगठन के मुताबिक, पहले कांग्रेस की ओर से लोकसभा में भी मुस्लिम सांसदों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रहती थी, लेकिन वर्तमान में राज्य से एक भी मुस्लिम सांसद लोकसभा में नहीं है।

संगठन ने यह भी कहा कि कांग्रेस की ओर से मुस्लिम उम्मीदवारों को दिए जाने वाले लोकसभा टिकटों की संख्या भी समय के साथ घटती गई है। उनका मानना है कि इससे समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ा है और संसद में उनकी मौजूदगी न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है।

समर्थन के मुकाबले भागीदारी कम होने का आरोप

फेडरेशन ने कांग्रेस को यह याद दिलाने की कोशिश की कि राज्य में पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी भूमिका रही है। संगठन के अनुसार, विधानसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय ने बड़ी संख्या में कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया था, जिसने पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिलाने में योगदान दिया।

इसके बावजूद संगठन ने आरोप लगाया कि सरकार, प्रशासनिक ढांचे, विश्वविद्यालयों, बोर्ड-निगमों और अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में समुदाय को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला। बयान में कहा गया कि समुदाय के भीतर यह धारणा बन रही है कि कांग्रेस कई बार उन सीटों पर भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारने से बचती है, जहां उनकी जीत की संभावना मजबूत होती है।

राहुल गांधी के बयान का भी किया उल्लेख

संगठन ने अपने बयान में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के हालिया रुख का भी जिक्र किया। फेडरेशन के अनुसार, राहुल गांधी ने पार्टी की अल्पसंख्यक इकाई को संगठन के भीतर मुस्लिम समुदाय की भागीदारी बढ़ाने पर जोर देने के निर्देश दिए थे। महासंघ का कहना है कि राज्यसभा चुनाव इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत देने का अवसर हो सकता है।

अब निगाहें कांग्रेस आलाकमान पर टिकी हैं कि वह उम्मीदवार चयन के दौरान इस मांग को कितना महत्व देता है। राज्यसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा राज्य की राजनीति में प्रतिनिधित्व और सामाजिक संतुलन की बहस को फिर से केंद्र में ले आया है।

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