SupremeCourt – 49 साल पुराने हत्या मामले में तीन आरोपी दोषमुक्त, फैसले ने न्याय प्रक्रिया पर उठाए सवाल
SupremeCourt- करीब पांच दशक पुराने एक हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए तीन आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है। वर्ष 1977 से जुड़े इस मामले में शीर्ष अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हो सका। हालांकि यह फैसला ऐसे समय आया है जब एक आरोपी अपनी उम्रकैद की पूरी सजा पहले ही काट चुका है, जिससे न्याय मिलने में हुई लंबी देरी पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

करीब पांच दशक तक चला कानूनी विवाद
यह मामला 28 जून 1977 को उत्तर प्रदेश में हुई एक हत्या की घटना से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 1981 में आरोपियों को दोषी मानते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया चलती रही। इस दौरान मूल आरोपियों में से दो की मृत्यु हो चुकी थी, जबकि शेष तीन आरोपियों के मामले पर सुनवाई जारी रही।
एक आरोपी ने पूरी उम्रकैद काटी
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दो आरोपियों को वर्ष 2013 में जमानत मिल गई थी, लेकिन हीरा लाल नामक आरोपी की जमानत याचिका स्वीकार नहीं की गई। इसके चलते उन्हें जेल में रहकर उम्रकैद की पूरी सजा भुगतनी पड़ी। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सजा में राहत दिए जाने के बाद ही उनकी रिहाई संभव हो सकी। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले में उन्हें भी दोषमुक्त घोषित कर दिया गया है।
गवाहों की विश्वसनीयता पर अदालत की आपत्ति
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की कहानी और उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि कथित प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास मौजूद थे। पीठ ने यह भी माना कि बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत दलीलों को केवल अनुमान बताकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पर्याप्त रूप से विश्वसनीय प्रतीत होती हैं।
घटना के विवरण पर भी उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि घटना उसी समय और उसी तरीके से हुई थी जैसा आरोप लगाया गया था। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जिन लोगों को प्रत्यक्षदर्शी बताया गया, उनका घटनास्थल पर मौजूद होना उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संदिग्ध और कम संभावित प्रतीत होता है। ऐसे में केवल इन गवाहियों के आधार पर दोष सिद्ध करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
निचली अदालतों के फैसलों पर भी टिप्पणी
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट की कार्यवाही का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, दोनों अदालतों ने मामले में मौजूद महत्वपूर्ण कमियों और गवाहों के बयानों में दिखाई देने वाली विसंगतियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे हालात में आरोपियों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए था, इसलिए उन्हें दोषमुक्त किया जाता है।