उत्तर प्रदेश

Plaque Controversy – कानपुर में शिलापट विवाद पर बढ़ी राजनीतिक बयानबाजी

Plaque Controversy – कानपुर के रामबाग क्षेत्र में एक सार्वजनिक शौचालय पर लगाए गए शिलापट को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। बीते कुछ दिनों से इस मुद्दे पर विभिन्न दलों के नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। सोमवार को मामले ने नया मोड़ तब लिया जब नगर निगम ने एक पुराने शिलापट को हटा दिया, जबकि दूसरे शिलापट को यथावत रखा गया। इसी को लेकर अलग-अलग पक्ष अपनी-अपनी दलीलें दे रहे हैं।

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नगर निगम की कार्रवाई पर उठे सवाल

जानकारी के अनुसार, नगर आयुक्त द्वारा निर्देश दिया गया था कि केवल वही शिलापट लगाए जाएं जो शासन द्वारा निर्धारित प्रारूप के अनुरूप हों। इसके बाद एक शिलापट हटाया गया, लेकिन दूसरा बोर्ड अपनी जगह बना रहा। इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं कि यदि निर्देश सभी गैर-मानक शिलापटों को हटाने का था, तो फिर एक बोर्ड को क्यों नहीं हटाया गया।

नामों को लेकर शुरू हुई बहस

विवाद की जड़ शिलापट पर दर्ज नामों को माना जा रहा है। पहले लगाए गए बोर्ड में स्थानीय विधायक का नाम शामिल नहीं था, जबकि कुछ अन्य जनप्रतिनिधियों के नाम दर्ज थे। बाद में लगाए गए शिलापट में क्षेत्रीय विधायक नसीम सोलंकी के साथ अन्य राजनीतिक व्यक्तियों के नाम भी जोड़े गए। इसी बदलाव के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गईं।

सोशल मीडिया पर भी छिड़ी चर्चा

मामले ने सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। कुछ भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने सीसामऊ क्षेत्र के विभिन्न शिलापटों की तस्वीरें साझा करते हुए सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सार्वजनिक धन से किए गए कार्यों के शिलापटों पर नामों के उल्लेख को लेकर स्पष्ट नियमों का पालन होना चाहिए। हालांकि सोशल मीडिया पर साझा की गई सामग्री की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

शासन के प्रारूप का हवाला

पूर्व विधायक इरफान सोलंकी ने इस विवाद के बीच शासन द्वारा निर्धारित शिलापट प्रारूप का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि सरकारी दिशा-निर्देशों में किन पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के नाम शामिल किए जा सकते हैं, इसकी स्पष्ट व्यवस्था दी गई है। उन्होंने दावा किया कि शिलापटों पर नाम दर्ज करने की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार ही होनी चाहिए।

भाजपा नेता ने दी सफाई

सीसामऊ विधानसभा सीट से भाजपा उम्मीदवार रह चुके सुरेश अवस्थी ने भी विवाद पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि शिलापट पर उनका नाम किस आधार पर जोड़ा गया, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। उनके अनुसार, निर्माण कार्य से जुड़े ठेकेदार या प्रक्रिया से उनका कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इस विषय पर अनावश्यक राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए।

इरफान सोलंकी ने उठाए प्रशासनिक प्रश्न

इरफान सोलंकी ने कहा कि उनका मुख्य मुद्दा शिलापटों में शासनादेश के पालन का है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई स्थानों पर ऐसे नाम भी दर्ज किए गए हैं जिनका उल्लेख निर्धारित प्रारूप में नहीं है। उनका कहना है कि यदि नियम पहले से तय हैं, तो सभी स्थानों पर एक समान व्यवस्था लागू होनी चाहिए।

पार्षद ने भी जताई आपत्ति

भाजपा पार्षद आलोक पांडेय ने भी इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि विधायक निधि या अन्य सार्वजनिक संसाधनों से कराए गए कार्यों में शिलापटों पर नाम लिखने की प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुरूप होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी जनप्रतिनिधि की वैधानिक स्थिति बदल चुकी है, तो उसके नाम के उपयोग को लेकर भी स्पष्टता होनी चाहिए।

प्रशासनिक निर्णय पर टिकी निगाहें

शिलापट विवाद अब केवल एक बोर्ड तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी दिशा-निर्देशों के पालन और जनप्रतिनिधियों के नामों के उपयोग से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। फिलहाल नगर निगम की कार्रवाई और शासन के नियमों की व्याख्या को लेकर अलग-अलग पक्ष अपनी बात रख रहे हैं। आने वाले दिनों में प्रशासन की ओर से इस विषय पर कोई स्पष्ट निर्णय या स्पष्टीकरण सामने आता है या नहीं, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।

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