Climate Change – गंगा के बढ़ते तापमान ने बढ़ाई पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता
Climate Change – गंगा नदी के जल तापमान में लगातार हो रही वृद्धि को लेकर वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है। हालिया अध्ययनों के अनुसार, नदी का पानी पहले की तुलना में अधिक गर्म हो रहा है, जिसका असर जलीय जीवों, नदी की पारिस्थितिकी और उससे जुड़े करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, कम वर्षा, घटता जल प्रवाह और हिमालयी ग्लेशियरों में बदलाव जैसी परिस्थितियां इस समस्या को और गंभीर बना रही हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, नदी के तापमान में बढ़ोतरी केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं है, बल्कि इसका असर मत्स्य पालन, कृषि और पेयजल संसाधनों पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि इस विषय को लेकर वैज्ञानिक समुदाय लगातार निगरानी और अध्ययन कर रहा है।
शोध में सामने आए महत्वपूर्ण संकेत
आईआईआईटी हैदराबाद के हाइड्रोक्लाइमेटिक रिसर्च ग्रुप और अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि गंगा के मध्य प्रवाह वाले हिस्सों में वर्ष 2009 से 2025 के बीच पानी के औसत तापमान में लगभग 1.88 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। यह परिवर्तन नदी के प्राकृतिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान बढ़ने के साथ पानी में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा कम होने लगती है। ऑक्सीजन का स्तर घटने से मछलियों, जलीय कीटों और अन्य जीवों के अस्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
जलीय जीवन और आजीविका पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार, नदी के जल में ऑक्सीजन की कमी का सीधा असर जैव विविधता पर पड़ता है। इससे मछलियों की संख्या और उनकी प्रजातियों पर प्रभाव पड़ सकता है, जिसका असर मत्स्य व्यवसाय से जुड़े लोगों की आय पर भी दिखाई दे सकता है।
इसके अलावा नदी के बदलते स्वरूप का असर कृषि गतिविधियों और पेयजल की उपलब्धता पर भी पड़ने की आशंका व्यक्त की गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि तापमान में वृद्धि का यह क्रम जारी रहा तो भविष्य में नदी आधारित आजीविका के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
वैश्विक स्तर पर भी दिख रही समान प्रवृत्ति
अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित शोध के अनुसार, पिछले चार दशकों के दौरान दुनिया की बड़ी संख्या में नदियों में ऑक्सीजन स्तर में गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञ इसे वैश्विक जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलावों से जोड़कर देख रहे हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि नदियों के तापमान और ऑक्सीजन स्तर की नियमित निगरानी अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है, ताकि समय रहते आवश्यक कदम उठाए जा सकें।
समाधान के तौर पर सुझाए गए कदम
वैज्ञानिकों ने इस चुनौती से निपटने के लिए कई उपाय सुझाए हैं। इनमें नदी किनारे हरित क्षेत्र विकसित करना, प्राकृतिक जल प्रवाह को बनाए रखना और प्रदूषण को नियंत्रित करना प्रमुख हैं। उनका कहना है कि नदी के आसपास वनस्पति बढ़ाने से जल तापमान को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि गंगा संरक्षण की योजनाओं में केवल प्रदूषण नियंत्रण ही नहीं, बल्कि तापमान वृद्धि जैसे उभरते पर्यावरणीय जोखिमों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
नदी में बढ़ती गर्मी पर वैज्ञानिक चेतावनी
वैज्ञानिक समुदाय ने “रिवराइन हीटवेव” यानी नदी में असामान्य रूप से लंबे समय तक बने रहने वाले उच्च तापमान को लेकर भी चेतावनी दी है। अध्ययनों के अनुसार यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन वर्तमान गति से जारी रहा, तो आने वाले दशकों में गंगा के बड़े हिस्से में ऐसे हालात अधिक बार देखने को मिल सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि नदी की पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखने के लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक होगा। इससे न केवल जलीय जीवन की रक्षा होगी, बल्कि नदी पर निर्भर समुदायों के हित भी सुरक्षित रहेंगे।