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Indian student discrimination USA: पालक पनीर गरम किया और छिड़ गई जंग, अब यूनिवर्सिटी भरेगी 1.6 करोड़ का हर्जाना

Indian student discrimination USA: अमेरिका की एक नामी यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान खाने की पसंद किसी के करियर को खत्म कर सकती है, यह सोचना भी डरावना लगता है। कोलोराडो बोल्डर विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रहे भारतीय छात्र आदित्य प्रकाश के साथ कुछ ऐसा ही हुआ जब उन्होंने विभाग के माइक्रोवेव में अपना लंच गरम करना चाहा। उस दिन वह डिब्बे में पालक पनीर लेकर आए थे, लेकिन जैसे ही उन्होंने खाना गरम करना शुरू किया, वहां मौजूद एक कर्मचारी ने आपत्ति जताते हुए (Cultural food bias incident) का माहौल पैदा कर दिया। कर्मचारी का कहना था कि खाने की गंध बहुत खराब है और इसे तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए, जबकि आदित्य के लिए यह महज उनकी संस्कृति का एक हिस्सा था।

Indian student discrimination USA
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भारतीय छात्रों के स्वाभिमान और करियर पर गहरी चोट

आदित्य प्रकाश और उनके साथ पढ़ने वाली पीएचडी स्कॉलर उर्मी भट्टाचार्य के लिए यह घटना केवल एक कहासुनी तक सीमित नहीं रही। आदित्य ने विनम्रता से समझाने की कोशिश की थी कि यह साधारण भोजन है और इससे किसी को कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन का रवैया बेहद सख्त रहा। धीरे-धीरे इस (Academic research career impact) ने इतना तूल पकड़ लिया कि दोनों प्रतिभाशाली छात्रों को अपनी पीएचडी की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। जिस शोध और भविष्य के लिए उन्होंने सालों मेहनत की थी, वह एक माइक्रोवेव विवाद की भेंट चढ़ गया और अंततः उन्हें भारी मन से भारत वापस लौटना पड़ा।

अदालत के दरवाजे तक पहुंची नस्लीय भेदभाव की गूंज

विश्वविद्यालय में बढ़ते मानसिक दबाव और भेदभाव के बाद इन छात्रों ने न्याय के लिए कोलोराडो की जिला अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपनी याचिका में स्पष्ट रूप से आरोप लगाया कि संस्थान में दक्षिण एशियाई मूल के लोगों के साथ (Systemic racism in universities) का व्यवहार किया जाता है। छात्रों का दर्द यह था कि उन्हें अपना लंच बॉक्स खोलने के लिए भी छिपकर अकेले स्थानों पर जाना पड़ता था। अदालत में पेश किए गए तथ्यों ने यह उजागर किया कि कैसे एक सामान्य सी घटना को आधार बनाकर विदेशी छात्रों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उन्हें असुरक्षित महसूस कराया गया।

मुआवजे की मरहम लेकिन भविष्य पर पाबंदी का दाग

लगभग दो साल तक चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाया जो न्याय और समझौते के बीच का रास्ता था। यूनिवर्सिटी प्रशासन दोनों छात्रों को कुल 2 लाख डॉलर, यानी करीब 1.6 करोड़ रुपये का (Legal settlement for students) देने पर राजी हुआ है। हालांकि, इस आर्थिक भरपाई के साथ कुछ कड़ी शर्तें भी जोड़ी गई हैं। विश्वविद्यालय इन छात्रों को केवल मास्टर्स की डिग्री प्रदान करेगा और भविष्य में उन्हें वहां दोबारा प्रवेश या किसी भी प्रकार की नौकरी नहीं दी जाएगी। यह समझौता उन छात्रों के लिए एक कड़वा अनुभव है जिन्होंने अपनी पीएचडी ग्रांट और रिसर्च को दांव पर लगा दिया था।

टीचिंग असिस्टेंटशिप का छिनना और दंगों का आरोप

उर्मी भट्टाचार्य ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि बिना किसी पूर्व चेतावनी या ठोस कारण के उनसे उनकी टीचिंग असिस्टेंटशिप छीन ली गई। स्थिति तब और भी भयावह हो गई जब अन्य भारतीय छात्रों के लंच लाने पर उन पर (Allegations of inciting unrest) जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। उर्मी अमेरिका में ‘मैरिटल रेप’ जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर शोध कर रही थीं, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने उनकी सालों की मेहनत पर पानी फेर दिया। कोलकाता की उर्मी और भोपाल के आदित्य के परिवारों ने अपनी जीवन भर की जमापूंजी उन्हें विदेश में पढ़ाने के लिए लगा दी थी, जो अब एक अधूरे सपने में तब्दील हो गई है।

सहपाठियों का समर्थन और यूनिवर्सिटी के दोहरे मापदंड

आदित्य प्रकाश का कहना है कि विभाग के माइक्रोवेव में पालक पनीर गरम करने के बाद जैसे उनकी पूरी दुनिया ही बदल गई और उन्हें अपराधी की तरह देखा जाने लगा। रोचक तथ्य यह है कि वहां कथित तौर पर ब्रॉकली गरम करना भी वर्जित था, जो प्रशासन के अजीबोगरीब नियमों को दर्शाता है। हालांकि, इस कठिन समय में आदित्य और उर्मी अकेले नहीं थे; उनके विभाग के 30 से अधिक छात्रों ने एक संयुक्त (Student solidarity statement) जारी कर उनका समर्थन किया था। इन छात्रों का मानना था कि एक शैक्षणिक संस्थान में सांस्कृतिक विविधता और खान-पान की आदतों का सम्मान होना चाहिए, न कि उन्हें प्रताड़ना का जरिया बनाया जाना चाहिए।

भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों के सपनों का बिखरना

आदित्य और उर्मी की कहानी उन हजारों भारतीय माता-पिता की चिंताओं को दर्शाती है जो अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए सात समंदर पार भेजते हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए अमेरिका में शिक्षा का खर्च उठाना (Financial sacrifice for education) की एक बड़ी दास्तान होती है। जब ऐसे छात्रों को केवल उनके भोजन की गंध के आधार पर बेदखल कर दिया जाता है, तो यह केवल दो व्यक्तियों की हार नहीं बल्कि एक पूरी व्यवस्था की विफलता है। 1.6 करोड़ रुपये का मुआवजा उनके बैंक खातों में तो आ जाएगा, लेकिन जो समय और शैक्षिक अवसर उन्होंने खोए हैं, उसकी भरपाई नामुमकिन है।

विदेशी संस्थानों में बढ़ते भेदभाव पर गंभीर सवाल

यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय छात्रों की सुरक्षा और उनके सम्मान को लेकर बड़े सवाल खड़े करता है। पालक पनीर विवाद ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक कहे जाने वाले विदेशी विश्वविद्यालयों में भी (Workplace diversity challenges) और नस्लीय पूर्वाग्रह की जड़ें बहुत गहरी हैं। इस घटना के बाद आदित्य और उर्मी अब अपने देश लौट आए हैं और नए सिरे से अपनी जिंदगी शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं। यह घटना विश्वभर के शैक्षणिक संस्थानों को यह चेतावनी देती है कि समावेशिता केवल विज्ञापनों में नहीं, बल्कि कैंपस के माइक्रोवेव रूम से लेकर क्लासरूम तक महसूस होनी चाहिए।

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