TribalReligion – जनगणना 2027 में सरना कोड की मांग तेज, राष्ट्रपति को पत्र…
TribalReligion – झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पत्र लिखकर वर्ष 2027 की जनगणना में सरना धर्म को अलग कोड के रूप में शामिल करने की मांग उठाई है। उन्होंने इस आग्रह को राज्य की जनता, खासकर देशभर के आदिवासी समुदाय की भावना से जुड़ा बताया है। पत्र में मुख्यमंत्री ने जनगणना प्रक्रिया शुरू करने के लिए राष्ट्रपति के प्रति आभार भी व्यक्त किया और इसे नीति निर्माण के लिए अहम बताया।

तथ्य आधारित नीति पर जोर
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि किसी भी देश के विकास के लिए सटीक आंकड़ों पर आधारित नीतियां बेहद जरूरी होती हैं। उन्होंने कहा कि जनगणना सिर्फ आंकड़ों का संकलन नहीं बल्कि भविष्य की योजनाओं की नींव होती है। झारखंड सरकार इस प्रक्रिया में हर स्तर पर सहयोग कर रही है। जनगणना के पहले चरण में अनुसूचित जाति और जनजाति से संबंधित जानकारी एकत्र की जाएगी, जबकि दूसरे चरण में व्यक्तिगत आंकड़ों का संकलन किया जाएगा।
जनगणना को बताया संवेदनशील प्रक्रिया
हेमंत सोरेन ने यह भी स्पष्ट किया कि जनगणना को केवल संख्याओं तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए। इसके जरिए समाज की संरचना, पहचान और आवश्यकताओं को समझा जाता है। उन्होंने याद दिलाया कि इससे पहले भी प्रधानमंत्री के समक्ष सरना धर्म को अलग पहचान देने का अनुरोध किया जा चुका है, क्योंकि यह मुद्दा आदिवासी समाज की आस्था और पहचान से जुड़ा हुआ है।
धार्मिक पहचान का अभाव बना चिंता का विषय
पत्र में मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत में विभिन्न समुदायों की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान उनके धर्म से भी जुड़ी होती है। हालांकि, आदिवासी समाज के पारंपरिक धर्म को अब तक आधिकारिक रूप से अलग पहचान नहीं मिल पाई है। उन्होंने इसे एक महत्वपूर्ण कमी बताया, जिसका असर नीति निर्माण और कल्याणकारी योजनाओं पर पड़ सकता है।
सर्ना धर्म की विशिष्टता पर जोर
मुख्यमंत्री ने सरना धर्म की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इसकी अपनी अलग परंपराएं, पूजा स्थल और देवताओं की मान्यता है। इसमें प्रकृति पूजा, ग्राम देवता और कुल देवता की परंपरा प्रमुख है, जो इसे अन्य धर्मों से अलग पहचान देती है। उन्होंने कहा कि इन विशेषताओं को देखते हुए इसे अलग धार्मिक कोड मिलना चाहिए, ताकि इसकी पहचान सुरक्षित रह सके।
आंकड़ों की कमी से नीति पर असर
हेमंत सोरेन ने चिंता जताई कि यदि किसी समुदाय से जुड़े सटीक आंकड़े समय पर उपलब्ध नहीं होते हैं, तो इसका असर दीर्घकालिक नीतियों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के धार्मिक आंकड़ों की अनुपस्थिति से उनके लिए बनाई जाने वाली योजनाएं पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाती हैं।
पहले भी सामने आई मांग
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में वर्ष 2011 की जनगणना का उदाहरण देते हुए बताया कि अलग कोड न होने के बावजूद देश के 21 राज्यों के लगभग 50 लाख लोगों ने स्वयं ‘सरना’ को अपने धर्म के रूप में दर्ज कराया था। इससे स्पष्ट है कि यह मांग लंबे समय से मौजूद है और व्यापक समर्थन भी रखती है।
केंद्र से हस्तक्षेप की अपेक्षा
पत्र के अंत में मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि जनगणना 2027 के दूसरे चरण के लिए तैयार किए जाने वाले प्रपत्र में सरना धर्म के लिए अलग कोड निर्धारित करने का निर्देश दिया जाए। उन्होंने कहा कि इससे आदिवासी समाज की पहचान को उचित स्थान मिलेगा और नीति निर्माण अधिक सटीक और प्रभावी हो सकेगा।