SupremeCourt – जानें निजी घर में कही बात कब नहीं मानी जाएगी सार्वजनिक अपमान…
SupremeCourt – सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी निजी घर के भीतर, बाहरी लोगों की गैरमौजूदगी में कही गई जातिसूचक बातें हर स्थिति में एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं मानी जा सकतीं। अदालत ने कहा कि इस कानून की संबंधित धाराओं के लागू होने के लिए कथित घटना का “पब्लिक व्यू” यानी सार्वजनिक दृष्टि में होना जरूरी है।

जस्टिस एनवी अंजारिया और जस्टिस पीके मिश्रा की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल आरोप लगाए जाने भर से कानून की धाराएं स्वतः लागू नहीं हो जातीं। मामले के तथ्यों और घटना की परिस्थितियों को भी देखना आवश्यक है।
अदालत ने ‘पब्लिक व्यू’ की व्याख्या की
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी घटना को सार्वजनिक रूप से हुआ मानने के लिए जरूरी है कि वहां आम लोग मौजूद हों या घटना ऐसी जगह हुई हो जहां बाहरी लोग उसे देख और सुन सकें। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर कथित टिप्पणी किसी घर की चारदीवारी के भीतर हुई है और वहां कोई स्वतंत्र व्यक्ति मौजूद नहीं था, तो इसे “पब्लिक व्यू” की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि कुछ परिस्थितियों में निजी स्थान भी सार्वजनिक दायरे में आ सकते हैं, यदि वहां बाहरी लोग मौजूद हों और वे घटना के गवाह बनें। अदालत ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हर मामले में परिस्थितियों का अलग-अलग मूल्यांकन जरूरी होता है।
संपत्ति विवाद से जुड़ा था मामला
यह मामला दिल्ली के एक परिवार के भीतर चल रहे संपत्ति विवाद से संबंधित था। शिकायतकर्ता ने अपने ही परिवार के कुछ सदस्यों पर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने और धमकी देने का आरोप लगाया था। शिकायत के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी।
मामले में शिकायतकर्ता और दो आरोपी आपस में सगे भाई बताए गए हैं, जबकि अन्य आरोपी परिवार की महिलाएं थीं। शिकायत में कहा गया था कि संपत्ति विवाद के दौरान कथित तौर पर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया और धमकी भी दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने जांच में बताई कमी
अदालत ने रिकॉर्ड और एफआईआर का अध्ययन करने के बाद पाया कि शिकायत में यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया था कि कथित घटना के समय कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद था या नहीं। जिन लोगों के नाम गवाह के रूप में दर्ज थे, वे शिकायतकर्ता के परिचित बताए गए और उनके बयानों से भी यह साबित नहीं हुआ कि उन्होंने घटना को प्रत्यक्ष रूप से देखा था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि लंबे समय से जातिसूचक व्यवहार किए जाने के आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे, जिनमें किसी विशेष घटना का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। इसी आधार पर अदालत ने माना कि एससी/एसटी एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत अपराध का प्रथम दृष्टया आधार पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हो सका।
आपराधिक धमकी का आरोप भी खारिज
मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 506 के तहत आपराधिक धमकी का आरोप भी लगाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस आरोप को भी रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि एफआईआर में ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि आरोपियों का उद्देश्य शिकायतकर्ता में भय या गंभीर मानसिक दबाव पैदा करना था।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और दिल्ली हाई कोर्ट के आदेशों को निरस्त करते हुए एफआईआर और उससे जुड़ी कार्यवाही को रद्द कर दिया।