VoterListReview – मतदाता सत्यापन मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा फैसला
VoterListReview – देश की चुनावी व्यवस्था और मतदाता सूची से जुड़े एक अहम विवाद पर सुप्रीम कोर्ट बुधवार को अपना फैसला सुनाने जा रहा है। यह मामला चुनाव आयोग द्वारा बिहार और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान से जुड़ा है। इस अभियान की वैधता को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं दायर की गई थीं, जिन पर अब सर्वोच्च अदालत का निर्णय आने वाला है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने की थी।

विशेष पुनरीक्षण अभियान पर उठा विवाद
निर्वाचन आयोग ने जून 2025 में बिहार से मतदाता सूची के विशेष सत्यापन अभियान की शुरुआत की थी। बाद में इसे पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों तक बढ़ाया गया। इस प्रक्रिया के दौरान उन मतदाताओं से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए जिनका नाम 2002 या 2003 की पुरानी मतदाता सूचियों में दर्ज नहीं मिला था।
शुरुआत में आयोग ने पहचान और नागरिकता से जुड़े सीमित दस्तावेज स्वीकार किए थे, लेकिन बाद में अदालत की टिप्पणी के बाद आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी को भी मान्य दस्तावेजों की सूची में शामिल किया गया। इस पूरी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों ने कई सवाल उठाए थे।
याचिकाकर्ताओं ने जताई संवैधानिक चिंता
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज और कई विपक्षी नेताओं ने अदालत में दायर याचिकाओं में कहा कि यह अभियान मतदाता सत्यापन से आगे बढ़कर नागरिकता जांच जैसा बन गया था। उनका आरोप था कि चुनाव आयोग ने अप्रत्यक्ष रूप से लोगों पर अपनी नागरिकता साबित करने का दबाव डाला।
याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए कहा कि विधानसभा चुनाव से पहले बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। उनके मुताबिक, इससे लाखों लोगों के मतदान अधिकार प्रभावित हुए। अदालत में यह भी दलील दी गई कि किसी नागरिक की नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का अधिकार क्षेत्र नहीं है और यह जिम्मेदारी केंद्र सरकार तथा संबंधित न्यायिक संस्थाओं की होती है।
चुनाव आयोग ने प्रक्रिया को बताया जरूरी
सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने अपने कदम का बचाव करते हुए कहा कि उसका उद्देश्य केवल मतदाता सूची को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना था। आयोग का कहना था कि वह किसी की नागरिकता तय नहीं कर रहा, बल्कि यह सुनिश्चित कर रहा है कि केवल पात्र नागरिक ही मतदान प्रक्रिया में शामिल हों।
आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने अदालत को बताया कि अभियान के दौरान पुलिस जांच जैसी कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर जानकारी एकत्र की गई और मृत, स्थानांतरित या डुप्लिकेट नामों की पहचान की गई। आयोग ने इसे नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने क्या कहा
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की शक्तियों और सीमाओं को लेकर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। अदालत ने कहा था कि मतदाता सूची से जुड़े फैसलों में पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन जरूरी है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया था कि किसी भी प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर नाम हटाने के बजाय समावेशी दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
पश्चिम बंगाल में शिकायतों और अपीलों की सुनवाई के लिए विशेष ट्रिब्यूनल भी गठित किए गए थे। इन ट्रिब्यूनलों में न्यायिक अधिकारियों और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को शामिल किया गया, ताकि प्रभावित लोग अपनी बात रख सकें।
फैसले पर टिकी देशभर की नजर
इस मामले में आने वाला फैसला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया की वैधता तक सीमित नहीं माना जा रहा। इससे चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों, मतदाता अधिकारों और नागरिकता से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्नों पर स्पष्टता आने की उम्मीद है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का निर्णय भविष्य में मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया और लोकतांत्रिक अधिकारों की व्याख्या को प्रभावित कर सकता है। चूंकि कई राज्यों में चुनाव इसी संशोधित सूची के आधार पर कराए जा चुके हैं, इसलिए इस फैसले का राजनीतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर व्यापक असर देखने को मिल सकता है।