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Cybersecurity – डार्क फ्लीट के जहाजों से बढ़ा वैश्विक सुरक्षा जोखिम

Cybersecurity – समुद्री व्यापार से जुड़े तथाकथित “डार्क फ्लीट” जहाज अब केवल नौवहन सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, पुराने और खराब रखरखाव वाले इन जहाजों में इस्तेमाल हो रही कमजोर डिजिटल प्रणालियां उन्हें साइबर हमलों के प्रति बेहद संवेदनशील बना रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन प्रणालियों का दुरुपयोग हुआ तो इसके प्रभाव समुद्री सुरक्षा, पर्यावरण और वैश्विक व्यापार पर पड़ सकते हैं।

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हालिया जांचों में सामने आया है कि कई जहाज आधुनिक संचार और रिमोट कंट्रोल तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। इससे साइबर जोखिम कई गुना बढ़ गया है।

जांच में सामने आई डिजिटल कमजोरियां

अमेरिकी तटरक्षक बल की साइबर सुरक्षा इकाइयों द्वारा किए गए निरीक्षण में कई चिंताजनक पहलू सामने आए। अधिकारियों के अनुसार, कुछ जहाजों में ऐसे सॉफ्टवेयर पाए गए जिनकी मदद से दूर बैठकर सिस्टम तक पहुंच बनाई जा सकती थी। इन डिजिटल माध्यमों के जरिए जहाजों की निगरानी और संचालन से जुड़े कार्य किए जा रहे थे।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऐसी प्रणालियां सुरक्षित न हों, तो अनधिकृत व्यक्ति भी इनमें प्रवेश कर सकते हैं। इससे जहाज संचालन, संचार व्यवस्था और अन्य महत्वपूर्ण प्रणालियों पर असर पड़ सकता है।

रिमोट एक्सेस टूल्स ने बढ़ाई चिंता

निरीक्षण के दौरान कई जहाजों में रिमोट एक्सेस से जुड़े सॉफ्टवेयर उपयोग में पाए गए। इन तकनीकों का उपयोग सामान्य परिस्थितियों में दूरस्थ प्रबंधन के लिए किया जाता है, लेकिन कमजोर सुरक्षा व्यवस्था होने पर यही तकनीक साइबर हमलावरों के लिए अवसर बन सकती है।

कुछ मामलों में अधिकारियों ने ऐसे संकेत भी पाए कि जहाजों की प्रणालियों तक स्थायी दूरस्थ पहुंच उपलब्ध थी। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील समुद्री प्रणालियों में इस प्रकार की पहुंच को नियंत्रित और सुरक्षित रखना बेहद आवश्यक है।

मैलवेयर और अनधिकृत सॉफ्टवेयर का पता चला

जांच के दौरान कुछ जहाजों में अनधिकृत या बिना लाइसेंस वाले सॉफ्टवेयर भी मिले। अधिकारियों के अनुसार, ऐसे सॉफ्टवेयर में सुरक्षा संबंधी कमजोरियां होने की आशंका अधिक रहती है। कुछ प्रणालियों में संदिग्ध डिजिटल फाइलें और संभावित मैलवेयर के संकेत भी दर्ज किए गए।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जहाजों के नेविगेशन या इंजन प्रबंधन सिस्टम प्रभावित होते हैं, तो इससे संचालन संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। बड़े तेल टैंकरों के मामले में ऐसी घटनाओं का प्रभाव और अधिक व्यापक हो सकता है।

पहचान छिपाने के लिए तकनीकी हेरफेर

जांच में यह भी पाया गया कि कुछ जहाज अपनी वास्तविक पहचान छिपाने के लिए ट्रैकिंग सिस्टम से जुड़े उपकरणों में बदलाव कर रहे थे। रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ मामलों में इलेक्ट्रॉनिक पहचान संबंधी जानकारी को बदलने या छिपाने की व्यवस्था मौजूद थी।

समुद्री सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी गतिविधियां निगरानी और ट्रैकिंग को कठिन बना देती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के पालन पर सवाल खड़े होते हैं।

वैश्विक स्तर पर बढ़ रही निगरानी

इन खुलासों के बाद कई देशों ने ऐसे जहाजों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखना शुरू कर दिया है। समुद्री सुरक्षा एजेंसियां और अंतरराष्ट्रीय संगठन अब साइबर सुरक्षा को भी जहाज निरीक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक समुद्री परिवहन में डिजिटल प्रणालियों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में साइबर सुरक्षा को नजरअंदाज करना केवल तकनीकी जोखिम नहीं, बल्कि आर्थिक और पर्यावरणीय खतरा भी बन सकता है।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत

समुद्री सुरक्षा से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए देशों के बीच बेहतर समन्वय और सूचना साझा करने की आवश्यकता है। सुरक्षित डिजिटल प्रणालियां, नियमित निरीक्षण और सख्त अनुपालन मानक भविष्य में ऐसे जोखिमों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

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