अंतर्राष्ट्रीय

Diplomacy – जर्मनी से अमेरिकी सैनिक हटाने पर बढ़ी ट्रंप प्रशासन की सख्ती

Diplomacy – ईरान को लेकर जारी वैश्विक तनाव के बीच अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के रिश्तों में दरार गहराती दिखाई दे रही है। इसी क्रम में अमेरिका ने जर्मनी से करीब 5 हजार सैनिकों को वापस बुलाने की तैयारी शुरू कर दी है। इस फैसले ने नाटो देशों के बीच नई राजनीतिक और सामरिक बहस छेड़ दी है।

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हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज पर तीखा हमला बोला था। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि जर्मनी को पहले अपने देश की आंतरिक समस्याओं, खासकर ऊर्जा संकट और आव्रजन मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए, बजाय इसके कि वह ईरान संघर्ष पर समय खर्च करे। उन्होंने यह भी कहा कि जर्मनी को रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कराने की दिशा में अधिक सक्रिय होना चाहिए।

सैन्य मौजूदगी घटाने की तैयारी

अमेरिकी रक्षा विभाग के सूत्रों के मुताबिक, यूरोप में तैनात सैनिकों की संख्या कम करने की योजना पर गंभीरता से काम चल रहा है। पेंटागन से जुड़े अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि जर्मनी में मौजूद कुछ अहम सैन्य इकाइयों को हटाया जा सकता है। इनमें ब्रिगेड कॉम्बैट टीम और लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली इकाइयां भी शामिल हैं।

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा कि यूरोप में सैन्य तैनाती की समीक्षा पहले से जारी थी और अब इसे तेज किया जाएगा। उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अपनाए गए मॉडल का जिक्र करते हुए कहा कि सैनिकों की रणनीतिक वापसी उसी तरह की प्रक्रिया का हिस्सा होगी।

ट्रंप और जर्मन नेतृत्व में बढ़ती दूरी

विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल सैन्य मुद्दों तक सीमित नहीं है। ट्रंप लंबे समय से नाटो के खर्च और यूरोपीय देशों की भूमिका को लेकर असंतोष जाहिर करते रहे हैं। उनका मानना रहा है कि अमेरिका पर सुरक्षा का अत्यधिक बोझ डाला गया है जबकि यूरोपीय देश पर्याप्त योगदान नहीं कर रहे।

दूसरी ओर जर्मनी यूरोप में अमेरिका का प्रमुख सहयोगी माना जाता है। वहां कई बड़े अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल नाटो अभियानों और मध्य पूर्व से जुड़े रणनीतिक मिशनों में किया जाता रहा है। ऐसे में सैनिकों की वापसी को दोनों देशों के संबंधों में बढ़ती राजनीतिक दूरी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

नाटो के भीतर बढ़ा असंतोष

ईरान संकट के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका ने सहयोगी देशों से समर्थन मांगा था। हालांकि कई नाटो सदस्य देशों ने प्रत्यक्ष सैन्य सहयोग से दूरी बनाए रखी। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि सहयोगी देशों ने अपेक्षित समर्थन नहीं दिया, जिससे अमेरिकी नेतृत्व में नाराजगी बढ़ी।

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि नाटो के भीतर पहले से मौजूद मतभेद अब अधिक खुलकर सामने आने लगे हैं। अमेरिका का यह कदम यूरोपीय देशों के लिए एक रणनीतिक संदेश भी माना जा रहा है कि भविष्य में उन्हें अपनी सुरक्षा नीति पर अधिक आत्मनिर्भर होना पड़ सकता है।

व्हाइट हाउस के पत्र ने बढ़ाई चर्चा

इस बीच व्हाइट हाउस की ओर से अमेरिकी संसद को भेजे गए एक पत्र ने भी बहस छेड़ दी है। पत्र में कहा गया कि खाड़ी क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति जारी रहने के बावजूद प्रशासन फिलहाल ईरान के साथ संघर्ष को समाप्त मानता है। इसे कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षक कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी से बचने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों के अनुसार, आने वाले दिनों में अमेरिका और यूरोपीय देशों के रिश्ते ईरान संकट, नाटो की भूमिका और वैश्विक सुरक्षा रणनीति पर काफी हद तक निर्भर करेंगे।

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