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Parliament – विपक्षी दलों में बदलाव के बीच संसद के संख्या समीकरण पर बढ़ी नजर

Parliament – लोकसभा में हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संख्या बल को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विभिन्न दलों में हुए संगठनात्मक बदलाव और कुछ सांसदों के नए राजनीतिक समूहों के साथ जाने की खबरों ने संसद के गणित को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इसी बीच आगामी मॉनसून सत्र में संभावित विधायी एजेंडे को लेकर भी राजनीतिक हलकों में अटकलें तेज हैं।

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बदलते राजनीतिक समीकरण पर नजर

हालिया घटनाक्रम में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) के कुछ सांसदों के अलग होने की खबरों ने विपक्षी खेमे की एकजुटता पर सवाल खड़े किए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इन बदलावों का असर संसद में संख्या बल पर पड़ता है, तो कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों के दौरान सरकार की स्थिति पहले की तुलना में मजबूत हो सकती है। हालांकि, अंतिम तस्वीर संसद में वास्तविक उपस्थिति और मतदान के समय ही स्पष्ट होगी।

मॉनसून सत्र में महत्वपूर्ण विधेयकों की संभावना

सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार आगामी मॉनसून सत्र में परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों और महिला आरक्षण कानून के क्रियान्वयन से संबंधित पहल को आगे बढ़ाने का प्रयास कर सकती है। इसके अलावा, एक प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक भी चर्चा में है, जिसमें गंभीर आपराधिक मामलों में लगातार 30 दिन तक जेल या न्यायिक हिरासत में रहने वाले मंत्रियों के पद को लेकर प्रावधान किए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि, सरकार की ओर से इन प्रस्तावों पर आधिकारिक कार्यक्रम संसद के एजेंडे के अनुसार ही स्पष्ट होगा।

संविधान संशोधन की प्रक्रिया क्या कहती है

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किसी भी संविधान संशोधन की शुरुआत संसद के किसी एक सदन में विधेयक पेश किए जाने से होती है। ऐसे विधेयक को पारित कराने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई समर्थन आवश्यक होता है। यदि लोकसभा के सभी 540 वर्तमान सदस्य मतदान में हिस्सा लें, तो किसी भी संशोधन को पारित कराने के लिए 360 मतों की जरूरत पड़ेगी। यही कारण है कि संसद में संख्या बल का हर बदलाव राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

वर्तमान संख्या बल का आकलन

इस वर्ष अप्रैल में हुए एक संविधान संशोधन विधेयक पर मतदान के दौरान 528 सांसदों ने हिस्सा लिया था। उस समय सरकार को 298 मत मिले थे, जबकि 230 सांसदों ने विरोध में मतदान किया था। साधारण बहुमत मिलने के बावजूद दो-तिहाई समर्थन का आंकड़ा पूरा नहीं हो सका। अब हालिया राजनीतिक बदलावों के बाद विभिन्न राजनीतिक आकलनों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के समर्थन का आंकड़ा लगभग 318 से 319 सांसदों तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। इसके बावजूद दो-तिहाई बहुमत के लिए आवश्यक संख्या अभी भी दूर बनी हुई है।

अन्य दलों की भूमिका पर टिकी नजर

राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि भविष्य के महत्वपूर्ण विधेयकों के दौरान कुछ क्षेत्रीय दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। विशेष रूप से DMK सहित कुछ दलों के रुख पर राजनीतिक विश्लेषकों की नजर बनी हुई है। वहीं, विपक्ष भी संसद में अपनी रणनीति तैयार कर रहा है ताकि महत्वपूर्ण विधेयकों पर संयुक्त रुख अपनाया जा सके। मतदान के दौरान विभिन्न दलों की उपस्थिति और संभावित अनुपस्थिति भी अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकती है।

राज्यसभा में भी चुनौती बरकरार

राज्यसभा की वर्तमान स्थिति भी सरकार के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उच्च सदन की 245 सीटों में फिलहाल 242 सदस्य हैं। यहां किसी संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई समर्थन हासिल करना आवश्यक होगा। उपलब्ध संख्या के आधार पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बहुमत के करीब जरूर दिखाई देता है, लेकिन दो-तिहाई समर्थन तक पहुंचने के लिए उसे अतिरिक्त सहयोग की आवश्यकता रहेगी। ऐसे में आगामी संसदीय सत्र के दौरान दोनों सदनों में संख्या बल और राजनीतिक रणनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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