उत्तर प्रदेश

LegalHeirship – जानें तलाक के बाद पत्नी की मृत्यु पर किसे होगा धन का अधिकार…

LegalHeirship – इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि आपसी सहमति से तलाक के बाद तय की गई धनराशि यदि पत्नी को मिलने से पहले ही उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उस राशि पर उसका वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में, यदि पत्नी की कोई संतान नहीं है और तलाक की डिक्री पहले ही पारित हो चुकी है, तो उसकी मां उस धनराशि की कानूनी उत्तराधिकारी मानी जाएगी। यह फैसला न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की एकल पीठ ने सुनाया।

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मामला क्या था

यह पूरा मामला किरन रायकवार नामक महिला से जुड़ा है, जिनकी मृत्यु तलाक के समझौते की राशि प्राप्त करने से पहले हो गई थी। पति-पत्नी के बीच हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक हुआ था। इस समझौते में पत्नी को कुल 20 लाख रुपये दिए जाने तय हुए थे। इसमें से 4 लाख रुपये पहले ही दिए जा चुके थे, जबकि बाकी 16 लाख रुपये फैमिली कोर्ट, बांदा में जमा थे।

भुगतान से पहले हुई मृत्यु

तलाक की प्रक्रिया पूरी होने और शेष राशि के भुगतान की तैयारी के दौरान ही महिला की मृत्यु हो गई। इसके बाद मृतका की मां ने अदालत में याचिका दायर कर शेष 16 लाख रुपये उन्हें देने की मांग की। इस मांग पर पति की ओर से आपत्ति जताई गई।

पति की दलील और अदालत का रुख

पति ने अदालत में तर्क दिया कि यह राशि केवल पत्नी के भरण-पोषण के लिए निर्धारित थी, इसलिए उसकी मृत्यु के बाद किसी अन्य व्यक्ति को इसका लाभ नहीं मिलना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट किया कि यह राशि मृतका की संपत्ति का हिस्सा है।

कानून की धाराओं की व्याख्या

अदालत ने अपने फैसले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की विभिन्न धाराओं का विस्तार से विश्लेषण किया। न्यायालय ने धारा 14 का हवाला देते हुए कहा कि किसी हिंदू महिला को जो भी संपत्ति प्राप्त होती है, चाहे वह गुजारा भत्ता हो या किसी न्यायिक आदेश के तहत मिली हो, वह उसकी पूर्ण संपत्ति मानी जाती है।

उत्तराधिकार का क्रम कैसे तय हुआ

धारा 15 के अनुसार, यदि किसी महिला की बिना वसीयत के मृत्यु होती है, तो उसकी संपत्ति पहले उसके बच्चों और पति को मिलती है। लेकिन इस मामले में तलाक की डिक्री पहले ही पारित हो चुकी थी, जिससे पति का वैधानिक संबंध समाप्त हो गया था। साथ ही, महिला की कोई संतान भी नहीं थी। ऐसी स्थिति में संपत्ति का अधिकार सीधे उसके माता-पिता को मिलता है।

मां को मिला वैधानिक अधिकार

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 146 के तहत मृतका की मां को कानूनी प्रतिनिधि माना जाएगा। इसलिए उन्हें ही उस राशि को प्राप्त करने का अधिकार है, जो फैमिली कोर्ट में जमा है।

अदालत का अंतिम आदेश

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट, बांदा को निर्देश दिया कि वह दो सप्ताह के भीतर 16 लाख रुपये की शेष राशि मृतका की मां को जारी करे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह रकम मृतका की व्यक्तिगत संपत्ति है और इसे उत्तराधिकार कानूनों के अनुसार ही वितरित किया जाना चाहिए।

यह फैसला उन मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी उदाहरण बनकर सामने आया है, जहां तलाक के बाद आर्थिक समझौतों और उत्तराधिकार के अधिकारों को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वैधानिक प्रक्रिया और कानून के तहत तय अधिकारों को किसी भी परिस्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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