EducationReform – उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा व्यवस्था बदली, आधुनिक पढ़ाई को मिला नया आधार
EducationReform – उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा से जुड़ी व्यवस्था में बड़ा बदलाव लागू हो गया है। मदरसा बोर्ड के स्थान पर अब राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण संस्थानों को मान्यता देगा। नई व्यवस्था का उद्देश्य धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक विषयों को जोड़ते हुए विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसरों का विस्तार करना है। सरकार का कहना है कि इससे मदरसों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को भविष्य में सामान्य शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।

नई व्यवस्था से बदलेंगे शिक्षा के अवसर
अब तक मदरसों से मिलने वाली मुंशी, मौलवी और आलिम जैसी उपाधियों को उच्च शिक्षा और कई सरकारी प्रक्रियाओं में व्यापक मान्यता नहीं मिलती थी। नई व्यवस्था लागू होने के बाद विद्यार्थियों को नियमित शैक्षणिक ढांचे के अनुरूप पढ़ाई का लाभ मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही वे हाईस्कूल और इंटरमीडिएट स्तर की शिक्षा पूरी कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर सकेंगे। चिकित्सा, इंजीनियरिंग और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों में प्रवेश की संभावनाएं भी पहले की तुलना में अधिक खुलेंगी।
पुराने प्रमाणपत्रों की सीमाएं रहीं चुनौती
उत्तराखंड में वर्ष 2011 में मदरसा बोर्ड का गठन किया गया था और वर्ष 2013 से परीक्षाएं आयोजित की जा रही थीं। इस दौरान करीब 45 हजार विद्यार्थियों ने विभिन्न धार्मिक पाठ्यक्रम पूरे किए। हालांकि इन प्रमाणपत्रों को सामान्य शिक्षा बोर्ड के समकक्ष मान्यता नहीं मिलने से विद्यार्थियों को आगे की पढ़ाई और रोजगार के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। नई व्यवस्था को इसी समस्या के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
पाठ्यक्रम में जीवन मूल्यों और आधुनिक विषयों पर जोर
नए शैक्षणिक ढांचे में धार्मिक अध्ययन के साथ संविधान, नागरिक कर्तव्य, सामाजिक समरसता, महिला सम्मान, पर्यावरण संरक्षण, नशामुक्ति और राष्ट्रीय एकता जैसे विषय भी शामिल किए गए हैं। विद्यार्थियों को डिजिटल माध्यमों के सुरक्षित उपयोग, भ्रामक सूचनाओं की पहचान और सोशल मीडिया के जिम्मेदार इस्तेमाल के बारे में भी जानकारी दी जाएगी। विभिन्न समुदायों की सांस्कृतिक और नैतिक शिक्षाओं को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है।
मान्यता और संचालन के लिए तय होंगे मानक
नई व्यवस्था के तहत मदरसों को शिक्षा विभाग से जूनियर, हाईस्कूल और इंटर स्तर की मान्यता मिल सकेगी। मान्यता प्राप्त संस्थानों में पीएम पोषण योजना के अंतर्गत मिड-डे मील की सुविधा भी जारी रहेगी। प्राधिकरण में सरकार द्वारा नामित अध्यक्ष और 11 सदस्य होंगे, जिनका कार्यकाल पांच वर्ष का रहेगा। नियमित अंतराल पर बैठकों के माध्यम से मान्यता, निरीक्षण और अन्य प्रशासनिक मामलों पर निर्णय लिए जाएंगे।
सभी मदरसों को पूरे करने होंगे निर्धारित मानदंड
प्रदेश में संचालित 452 मदरसों में से कई संस्थान पहले से आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप कार्य कर रहे हैं। ऐसे संस्थानों को नई व्यवस्था में अपेक्षाकृत कम कठिनाई होगी। हालांकि जिन मदरसों के पास आवश्यक भूमि, भवन, पंजीकरण, खेल मैदान और प्रशिक्षित शिक्षकों जैसी सुविधाएं नहीं हैं, उन्हें निर्धारित मानकों को पूरा करना होगा। इससे शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता और पारदर्शिता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।
तकनीक आधारित शिक्षण को मिलेगा बढ़ावा
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अनुसार धार्मिक शिक्षा के साथ तकनीक आधारित शिक्षण को भी प्राथमिकता दी जाएगी। विद्यार्थियों के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म, मोबाइल एप, क्यूआर कोड आधारित सामग्री, ऑडियो-वीडियो संसाधन और वर्चुअल शिक्षण जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके अलावा हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और कंप्यूटर जैसे विषयों को भी नियमित अध्ययन का हिस्सा बनाया जाएगा ताकि छात्र आधुनिक शिक्षा प्रणाली के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ सकें।
सहयोग की अपील और नई सोच पर जोर
सरकार ने धर्मगुरुओं, शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों से इस नई व्यवस्था को सफल बनाने में सहयोग की अपील की है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य धार्मिक शिक्षा को बनाए रखते हुए विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराना है। नई प्रणाली के माध्यम से संस्थानों को पारदर्शी मान्यता प्रक्रिया, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आधुनिक संसाधनों से जोड़ने की दिशा में काम किया जाएगा।