उत्तराखण्ड

HerbalCrisis – हिमालय से तेजी से गायब हो रही हैं दुर्लभ आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां

HerbalCrisis – आयुर्वेद में बेहद महत्वपूर्ण मानी जाने वाली अष्टवर्ग की दुर्लभ जड़ी-बूटियां अब हिमालयी क्षेत्रों से तेजी से कम होती जा रही हैं। च्यवनप्राश और कई रोग प्रतिरोधक दवाओं में इस्तेमाल होने वाली इन वनस्पतियों पर जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित दोहन का गहरा असर पड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार काकोली, क्षीर काकोली, जीवक और ऋषभक जैसी प्रजातियां अब विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं, जबकि मेदा, महामेदा, रिद्धि और वृद्धि की संख्या भी लगातार घट रही है।

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ये दुर्लभ जड़ी-बूटियां मुख्य रूप से हिमालय के 2500 से 4500 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाई जाती हैं। लंबे समय से इनका उपयोग पारंपरिक आयुर्वेदिक उपचार और ताकत बढ़ाने वाली औषधियों में किया जाता रहा है। वन विभाग की अनुसंधान शाखा ने इन प्रजातियों को बचाने के लिए उत्तराखंड के हर्षिल क्षेत्र में विशेष नर्सरी तैयार की है, जहां इनके पौधे संरक्षित किए जा रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन और दोहन बना बड़ा खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान में लगातार बदलाव, अनियमित बारिश और बढ़ती मानवीय गतिविधियों का असर इन जड़ी-बूटियों पर साफ दिखाई दे रहा है। कई स्थानों पर इनका प्राकृतिक आवास तेजी से खत्म हो रहा है। इसके अलावा बाजार में बढ़ती मांग के कारण इनका अत्यधिक संग्रहण भी स्थिति को गंभीर बना रहा है।

वन विभाग से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, कई जड़ी-बूटियां अब पहले की तुलना में बहुत कम दिखाई देती हैं। काकोली को सबसे अधिक संकटग्रस्त माना जा रहा है। वहीं क्षीर काकोली, जीवक और ऋषभक भी सीमित क्षेत्रों तक सिमटती जा रही हैं। संरक्षण के लिए इनके पौधों को तैयार कर दोबारा प्राकृतिक वातावरण में लगाने की योजना पर काम किया जा रहा है।

पूरा हिमालयी क्षेत्र संकट से प्रभावित

यह समस्या केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे हिमालयी राज्यों में भी इन औषधीय पौधों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। आयुर्वेद विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इनके संरक्षण के ठोस प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में कई प्रजातियां पूरी तरह गायब हो सकती हैं।

अष्टवर्ग की जड़ी-बूटियों का उपयोग लंबे समय से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, शारीरिक कमजोरी दूर करने और फेफड़ों व हृदय संबंधी समस्याओं में किया जाता रहा है। च्यवनप्राश सहित कई आयुर्वेदिक टॉनिक और औषधियों में इनका मिश्रण होता है।

औषधीय गुणों के कारण बढ़ी मांग

काकोली को शरीर में ताकत और ऊर्जा बढ़ाने वाली जड़ी-बूटी माना जाता है। वहीं क्षीर काकोली का उपयोग फेफड़ों और हृदय से जुड़ी समस्याओं में किया जाता है। जीवक को आयुर्वेद में शरीर को पुनर्जीवित करने वाली औषधि बताया गया है, जबकि ऋषभक रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में उपयोगी मानी जाती है।

मेदा और महामेदा जैसी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल शरीर को पोषण देने, मानसिक तनाव कम करने और कमजोरी दूर करने में किया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन दुर्लभ पौधों का संरक्षण केवल आयुर्वेद के लिए ही नहीं, बल्कि हिमालयी जैव विविधता को बचाने के लिए भी बेहद जरूरी है।

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