ElectionCommission – वोटर लिस्ट पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया अधिकार
ElectionCommission – सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए बिहार समेत कई राज्यों में चल रहे मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान को वैध माना है। अदालत ने कहा कि निर्वाचन आयोग को वोटर लिस्ट की जांच और सत्यापन करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार केवल मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने तक सीमित रहेगा।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का नाम वोटर सूची से हटाए जाने का मतलब यह नहीं माना जा सकता कि उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो गई है। अदालत के अनुसार, नागरिकता पर अंतिम निर्णय संबंधित सक्षम प्राधिकारी ही करेंगे।
निष्पक्ष चुनाव के लिए सही वोटर लिस्ट जरूरी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान प्रक्रिया तक सीमित नहीं होते। अदालत के मुताबिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इस बात पर भी निर्भर करती है कि मतदाता सूची कितनी सटीक और भरोसेमंद है।
पीठ ने माना कि पिछले कई दशकों में बड़े पैमाने पर शहरीकरण, पलायन और जनसंख्या बदलाव के कारण मतदाता सूची में त्रुटियां आने की संभावना बढ़ी है। ऐसे में सूची की नियमित जांच और सुधार आवश्यक माना गया।
नागरिकता जांच को लेकर अदालत की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि चुनाव आयोग जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत नागरिकता से जुड़े पहलुओं की जांच कर सकता है, लेकिन यह केवल मतदाता सूची के संदर्भ में होगा। अगर किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज संदिग्ध पाए जाते हैं, तो आयोग को उसका नाम जोड़ने से इनकार करने या हटाने का अधिकार है।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग का निर्णय अंतिम नहीं माना जाएगा। नागरिकता को लेकर अंतिम फैसला नागरिकता अधिनियम के तहत अधिकृत अधिकारी ही करेंगे।
हटाए गए नामों पर दिए गए निर्देश
अदालत ने उन मामलों पर भी निर्देश जारी किए जिनमें नागरिकता को लेकर संदेह के आधार पर मतदाता सूची से नाम हटाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि ऐसे मामलों को चार सप्ताह के भीतर संबंधित अधिकारियों के पास भेजा जाए।
साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे प्रभावित लोगों को नोटिस जारी करें और उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दें। यदि जांच में व्यक्ति भारतीय नागरिक पाया जाता है, तो उसका नाम दोबारा मतदाता सूची में जोड़ा जाएगा।
क्या है विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान
चुनाव आयोग ने वर्ष 2025 में बिहार से मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण अभियान की शुरुआत की थी। बाद में इसे अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया।
इस प्रक्रिया के तहत उन मतदाताओं से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए थे जिनके नाम 2002 या 2003 की पुरानी मतदाता सूची में दर्ज नहीं थे। इसका उद्देश्य मतदाता सूची में मौजूद दोहराव और त्रुटियों को दूर करना बताया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने उठाए थे सवाल
इस प्रक्रिया के खिलाफ कई संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह प्रक्रिया राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर जैसी प्रतीत होती है और इससे गरीब, प्रवासी तथा दस्तावेज न रखने वाले लोगों को मतदान अधिकार से वंचित किया जा सकता है।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने अदालत में कहा कि मतदाता सूची को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाए रखना उसका संवैधानिक दायित्व है। आयोग के मुताबिक, मृत, स्थानांतरित और फर्जी नाम हटाना जरूरी है ताकि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे।
अदालत ने बरकरार रखा आयोग का अधिकार
अंतिम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना निर्वाचन आयोग के संवैधानिक अधिकारों के दायरे में आता है। अदालत ने यह भी माना कि प्रक्रिया के दौरान नागरिकों को सुनवाई और दस्तावेज प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए।