Parenting Tips – तीन साल की उम्र के बाद बच्चों की परवरिश में इन आदतों से बचने का करें प्रयास
Parenting Tips – बच्चों के शुरुआती साल उनके व्यक्तित्व, व्यवहार और भावनात्मक विकास की नींव तैयार करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दो से तीन साल की उम्र से ही बच्चों को सही दिशा, सीमाओं की समझ और अच्छे व्यवहार की सीख देना शुरू कर देना चाहिए। इसी दौरान माता-पिता की कुछ आदतें ऐसी होती हैं, जो अनजाने में बच्चे के आत्मविश्वास और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकती हैं।

बच्चों पर स्नेह जताने का दबाव न बनाएं
कई परिवारों में बच्चों को रिश्तेदारों या परिचितों से मिलने पर गले लगाने या चूमने के लिए कहा जाता है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों को अपनी सहजता के अनुसार व्यवहार करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। जब बच्चे किसी व्यक्ति के साथ सहज महसूस करते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से अपनापन दिखाते हैं। ऐसे में उन पर जबरन स्नेह प्रदर्शित करने का दबाव बनाना उन्हें असहज कर सकता है।
गलत व्यवहार को सुधारें, बच्चे को नहीं
यदि बच्चा कोई गलती करता है तो उसके व्यवहार को समझाकर सुधारने की कोशिश करना अधिक प्रभावी माना जाता है। बच्चों को बार-बार “बैड बॉय” या “बैड गर्ल” जैसे शब्दों से संबोधित करना उनके आत्मसम्मान पर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे की पहचान उसकी गलती से नहीं बल्कि उसके सीखने और सुधारने की क्षमता से जुड़ी होनी चाहिए।
जबरदस्ती खाना खिलाने से बचें
अक्सर माता-पिता बच्चों को अधिक खिलाने की कोशिश में उन पर दबाव डाल देते हैं। बाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को अपनी भूख के अनुसार खाने देना और परिवार के साथ बैठकर भोजन करने की आदत विकसित करना अधिक लाभकारी होता है। इससे स्वस्थ खानपान की आदतें विकसित होती हैं और भोजन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनता है।
दूसरे बच्चों से तुलना करना नुकसानदायक
हर बच्चे का विकास अलग गति से होता है। कोई बच्चा जल्दी बोलना सीखता है तो कोई शारीरिक गतिविधियों में आगे होता है। ऐसे में बच्चों की तुलना उनके हमउम्र साथियों से करना उनके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञ माता-पिता को सलाह देते हैं कि वे बच्चे की व्यक्तिगत प्रगति पर ध्यान दें।
हर बड़े की बात मानने के लिए मजबूर न करें
बच्चों को सम्मान और शिष्टाचार सिखाना जरूरी है, लेकिन हर परिस्थिति में हर बड़े की बात मानने के लिए मजबूर करना उचित नहीं माना जाता। कुछ मामलों में बच्चों को अपनी पसंद और असहजता व्यक्त करने का अवसर देना भी आवश्यक है। इससे उनमें आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना मजबूत होती है।
बच्चों की भावनाओं को गंभीरता से लें
छोटे बच्चे भी अपनी भावनाओं को गहराई से महसूस करते हैं, भले ही वे उन्हें शब्दों में पूरी तरह व्यक्त न कर पाएं। यदि बच्चा किसी व्यक्ति के पास जाने से बच रहा है, अचानक चिड़चिड़ा हो रहा है या किसी बात से परेशान दिख रहा है, तो उसकी भावनाओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की बात सुनना और उनकी भावनाओं को समझना स्वस्थ मानसिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
हर समय आदर्श व्यवहार की अपेक्षा न रखें
तीन साल के आसपास के बच्चे सीखने और दुनिया को समझने की प्रक्रिया में होते हैं। इस दौरान वे सीमाओं को परखते हैं और नई प्रतिक्रियाएं विकसित करते हैं। ऐसे में उनसे हर समय पूरी तरह अनुशासित और परिपक्व व्यवहार की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं माना जाता। धैर्य और निरंतर मार्गदर्शन बच्चों के विकास में अधिक सहायक होते हैं।
रोने पर तुरंत मोबाइल या टीवी देने की आदत छोड़ें
कई बार बच्चों को शांत कराने के लिए मोबाइल फोन या टीवी का सहारा लिया जाता है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि हर भावनात्मक प्रतिक्रिया का समाधान स्क्रीन के जरिए करना बच्चों की भावनात्मक समझ को प्रभावित कर सकता है। बच्चों की बात सुनना, उनसे संवाद करना और उनकी भावनाओं को समझना अधिक प्रभावी तरीका माना जाता है।