Election Commission – TMC विवाद के बीच राज्यसभा उपचुनाव पर टिकी सबकी नजर
Election Commission- पश्चिम बंगाल में राज्यसभा की तीन रिक्त सीटों पर उपचुनाव की घोषणा के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी संगठनात्मक विवाद एक बार फिर केंद्र में आ गया है। पार्टी के दो अलग-अलग गुट खुद को वास्तविक नेतृत्व का दावा कर रहे हैं, जिससे चुनाव आयोग के सामने पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर निर्णय लेने की चुनौती बढ़ गई है। यदि दोनों पक्ष अपने-अपने प्रत्याशी उतारते हैं, तो आयोग को समय रहते स्थिति स्पष्ट करनी पड़ सकती है।

तीन सीटें खाली होने के बाद तय हुआ चुनाव कार्यक्रम
राज्यसभा की जिन तीन सीटों पर उपचुनाव होना है, वे पूर्व सांसद सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक के इस्तीफों के बाद रिक्त हुई थीं। निर्वाचन आयोग के कार्यक्रम के अनुसार इन सीटों के लिए 24 जुलाई को मतदान होगा, जबकि नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 14 जुलाई निर्धारित की गई है। विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए राजनीतिक दलों की रणनीति पर भी सभी की नजर बनी हुई है।
दो गुटों के दावे से बढ़ी आयोग की जिम्मेदारी
तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुट अपने-अपने अधिकृत उम्मीदवार उतारने की तैयारी में हैं। ऐसी स्थिति बनने पर चुनाव आयोग को यह तय करना होगा कि आधिकारिक उम्मीदवार किसे माना जाए। इसके साथ ही अधिकृत एजेंट की नियुक्ति से जुड़े Form 22A को लेकर भी निर्णय आवश्यक होगा, क्योंकि अलग-अलग दावे आयोग के समक्ष प्रक्रिया को जटिल बना सकते हैं।
चुनाव चिह्न पर अस्थायी रोक की संभावना
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी का मानना है कि अंतिम फैसला आने तक आयोग पार्टी के नाम और “जोड़ा फूल” चुनाव चिह्न के उपयोग पर अस्थायी रोक लगाने का विकल्प अपना सकता है। ऐसी स्थिति में दोनों गुटों को अलग-अलग अस्थायी नाम और अलग चुनाव चिह्न देकर उपचुनाव लड़ने की अनुमति दी जा सकती है, ताकि चुनाव प्रक्रिया बिना किसी बाधा के आगे बढ़ सके।
दोनों पक्षों ने आयोग के सामने रखे अपने-अपने तर्क
निर्वाचन आयोग ने 2 जुलाई को जारी निर्देश में दोनों गुटों से 6 जुलाई तक अपने दावों के समर्थन में आवश्यक दस्तावेज जमा करने को कहा था। ममता बनर्जी समर्थक गुट का कहना है कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का कार्यकाल 2027 तक वैध है और संगठन पर उनका ही अधिकार है। इस पक्ष ने विरोधी गुट पर पार्टी कार्यालय पर अवैध कब्जे का भी आरोप लगाया है।
दूसरी ओर, रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने इन आरोपों को अस्वीकार करते हुए स्वयं को वास्तविक तृणमूल कांग्रेस बताया है। उनके अनुसार पार्टी के अधिकांश विधायक, कई पूर्व मंत्री, पार्षद और जिला परिषद प्रतिनिधि उनके साथ हैं। इस गुट ने यह भी दावा किया है कि नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी से जुड़े सभी आवश्यक दस्तावेज आयोग के समक्ष जमा कर दिए गए हैं।
किन आधारों पर तय होगा असली दल
चुनाव चिह्न आदेश, 1968 के तहत किसी राजनीतिक दल के वास्तविक स्वरूप का निर्धारण संगठन के संविधान, उसके मूल उद्देश्य और बहुमत के आधार पर किया जाता है। निर्वाचन आयोग इन्हीं मानकों के आधार पर दोनों पक्षों के दावों की जांच कर रहा है। राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार के नामांकन के लिए कम से कम 10 विधायकों अथवा निर्वाचन मंडल के 10 प्रतिशत सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है, और उपलब्ध जानकारी के अनुसार दोनों गुट इस शर्त को पूरा करने की स्थिति में हैं।
पहले भी सामने आ चुका है ऐसा मामला
यदि नामांकन की अंतिम तिथि तक आयोग अंतिम निर्णय नहीं दे पाता, तो विवाद न्यायालय तक भी पहुंच सकता है। इससे पहले शिवसेना में विभाजन के दौरान भी चुनाव आयोग ने मूल चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से रोक दिया था और दोनों गुटों को अलग-अलग पहचान के साथ चुनाव लड़ने की अनुमति दी थी। बाद में विस्तृत सुनवाई के बाद पार्टी का आधिकारिक नाम और चुनाव चिह्न एकनाथ शिंदे गुट को सौंपा गया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान मामले में भी आयोग आवश्यकता पड़ने पर इसी तरह की प्रक्रिया अपना सकता है।