ChhathSong – छठ के पहले रिकॉर्डेड गीत की आवाज थीं पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी…
ChhathSong- छठ महापर्व केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस पर्व के दौरान गाए जाने वाले लोकगीत इसकी परंपरा को और अधिक जीवंत बनाते हैं। इन्हीं गीतों में “उग हो सुरुज देव भइल भिनुसार…” सबसे लोकप्रिय रचनाओं में गिना जाता है। हालांकि, आम धारणा यह रही है कि इस गीत को सबसे पहले पद्मश्री शारदा सिन्हा ने गाया था, जबकि उपलब्ध संगीत इतिहास के अनुसार इसका पहला रिकॉर्डेड संस्करण प्रसिद्ध लोक गायिका पद्मश्री विंध्यवासिनी देवी की आवाज में सामने आया था।

रेडियो से शुरू हुई लोकसंगीत की पहचान
विंध्यवासिनी देवी बिहार के लोकसंगीत की उन प्रमुख हस्तियों में शामिल थीं, जिन्होंने पारंपरिक गीतों को रिकॉर्डिंग के माध्यम से व्यापक पहचान दिलाई। वह पटना आकाशवाणी की शुरुआती महिला कलाकारों में गिनी जाती हैं। उन्होंने रेडियो के साथ-साथ एचएमवी (HMV) और फिल्मों के लिए भी अनेक पारंपरिक छठ गीत रिकॉर्ड किए। बाद के वर्षों में शारदा सिन्हा ने भी छठ गीतों को अपनी मधुर आवाज से देश-विदेश तक पहुंचाया और इन्हें नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बनाया।
कई यादगार लोकगीतों को दी अमर पहचान
“उग हो सुरुज देव…” के अलावा विंध्यवासिनी देवी ने कई ऐसे लोकगीत गाए, जो आज भी छठ और अन्य पारंपरिक अवसरों पर सुनाई देते हैं। इनमें “सोने के खरउवां हो दीनानाथ…”, “केरवा जे फरेला घवद से…”, “केकर नैया में इर्ची मिरीचिया”, विवाह गीत और सावनी-झूमर जैसे अनेक लोकगीत शामिल हैं। इन गीतों के जरिए उन्होंने बिहार की लोक संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
गांव-गांव जाकर संजोई लोकधरोहर
मुजफ्फरपुर में जन्मी विंध्यवासिनी देवी केवल गायिका ही नहीं, बल्कि लोकसंगीत की शोधकर्ता भी थीं। उन्होंने विभिन्न गांवों का दौरा कर लोकगीतों को संकलित किया और उन्हें लिखित रूप में सुरक्षित रखने का प्रयास किया। उस दौर में जब महिलाओं का सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होना आसान नहीं माना जाता था, तब उन्होंने लोक परंपराओं को सहेजने का जिम्मा उठाया। उन्होंने मैथिली, भोजपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी कई लोकप्रिय गीत गाए।
विदेशों तक पहुंचाई बिहार की संस्कृति
विंध्यवासिनी देवी ने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी बिहार के लोकसंगीत का परिचय कराया। मॉरिशस जैसे देशों में उन्होंने लोकगीतों की प्रस्तुति देकर प्रवासी भारतीयों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया। उनके कार्यक्रमों ने बिहार की लोक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संगीत के माध्यम से उन्होंने लोक संस्कृति को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सांस्कृतिक विरासत के रूप में स्थापित किया।
राष्ट्रीय सम्मान से मिला योगदान का गौरव
लोकसंगीत के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए विंध्यवासिनी देवी को पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी सम्मान और अहिल्याबाई सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। संगीत विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार के पारंपरिक लोकगीतों को संरक्षित और लोकप्रिय बनाने में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है। आज भी छठ पर्व के अवसर पर उनके गाए गीत श्रद्धा और परंपरा के साथ सुने जाते हैं।