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birthday bomb: जन्मदिन पर मिला सबसे बड़ा कानूनी झटका, सोनिया गांधी को मिला नोटिस

birthday bomb: भारतीय राजनीति की दिग्गज हस्ती और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आज अपना 79वां जन्मदिन मनाया। हालाँकि, उनका यह जन्मदिन एक कानूनी चुनौती के बीच आया है। दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें और दिल्ली पुलिस को एक याचिका (Petition) पर नोटिस जारी किया है। यह मामला सोनिया गांधी पर भारत की नागरिकता मिलने से पहले ही वोटर लिस्ट (Voter List) में नाम दर्ज कराने के गंभीर आरोपों से जुड़ा है। यह कानूनी कार्रवाई उस समय हुई जब सोनिया गांधी देश के एक प्रमुख विपक्षी दल की नेता हैं। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court) ने इस मामले में आगे की कार्यवाही के लिए 6 जनवरी 2026 की तारीख तय की है। यह घटनाक्रम दिखाता है कि कानून और राजनीति का टकराव किस तरह से महत्वपूर्ण हस्तियों के जीवन में भी दखल दे सकता है।

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मजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका (Criminal Revision)

यह पूरा मामला एक आपराधिक पुनर्विचार याचिका (Criminal Revision Petition) से शुरू हुआ है। याचिकाकर्ता विकास त्रिपाठी ने एक मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस पिछले आदेश को चुनौती दी है, जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया गया था। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, स्पेशल जज विशाल गोगने की अदालत ने सीनियर एडवोकेट पवन नारंग की शुरुआती दलीलें सुनने के बाद यह नोटिस (Summons) जारी किया। इस याचिका का मूल उद्देश्य निचली अदालत के 11 सितंबर के आदेश को पलटवाना है, जिसे एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया ने दिया था। इस तरह की याचिका न्यायिक प्रक्रिया में निचली अदालत के फैसले को उच्च अदालत में चुनौती देने के लिए दायर की जाती है, ताकि मामले की फिर से जांच हो सके।

नागरिकता से पहले ही वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने का आरोप (Citizenship Status)

याचिकाकर्ता विकास त्रिपाठी का दावा है कि सोनिया गांधी का नाम वर्ष 1980 में नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की वोटर लिस्ट में शामिल किया गया था। यह तथ्य याचिका को विवादास्पद बनाता है क्योंकि उनका दावा है कि सोनिया गांधी को भारत की नागरिकता (Citizenship Status) आधिकारिक तौर पर अप्रैल 1983 में मिली थी। त्रिपाठी ने यह भी बताया कि 1980 में नाम दर्ज होने के बाद, इसे 1982 में हटा दिया गया था, और फिर 1983 में नागरिकता मिलने के बाद इसे दोबारा शामिल किया गया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि नागरिकता न होते हुए भी वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराना अवैध और अपराध है। यह दावा भारतीय चुनावी कानूनों (Electoral Laws) और नागरिकता नियमों के उल्लंघन की ओर इशारा करता है।

मजिस्ट्रेट कोर्ट ने क्यों खारिज की थी पिछली याचिका? (Court Jurisdiction)

याचिकाकर्ता की पिछली मांग को एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट वैभव चौरसिया ने 11 सितंबर के आदेश में खारिज कर दिया था। जज चौरसिया ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि कोर्ट याचिकाकर्ता की मांग के अनुसार जांच शुरू नहीं कर सकता। उन्होंने तर्क दिया था कि किसी व्यक्ति की नागरिकता (Nationality) से जुड़े मामले पूरी तरह से केंद्र सरकार (Central Government) के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसके अलावा, किसी व्यक्ति को वोटर लिस्ट में शामिल करने या बाहर करने की योग्यता तय करने का अधिकार भारत के चुनाव आयोग (Election Commission of India – ECI) के पास है। कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में न्यायिक जांच शुरू करने से संवैधानिक अधिकारियों (Constitutional Authorities) को सौंपे गए क्षेत्रों में अनावश्यक दखलअंदाजी होगी, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 329 का भी उल्लंघन होगा।

नागरिकता मिलने से पहले दस्तावेज़ों की जालसाजी का शक (Document Forgery)

याचिकाकर्ता विकास त्रिपाठी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील पवन नारंग ने राउज एवेन्यू कोर्ट में अपनी दलीलें पेश कीं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि अगर सोनिया गांधी का नाम नागरिकता मिलने से पहले ही वोटर लिस्ट में दर्ज था, तो इसका सीधा मतलब है कि कुछ दस्तावेज (Documents) जाली बनाए गए होंगे। वकील नारंग ने ज़ोर देकर कहा कि वोटर लिस्ट में नाम शामिल करवाने के लिए निश्चित रूप से कुछ दस्तावेज जाली, मनगढ़ंत (Fabricated) और झूठे बनाए गए होंगे। नारंग ने बताया कि त्रिपाठी ने इन तथ्यों की जांच के लिए पुलिस से संपर्क किया था, लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया था। उनका मुख्य तर्क यह था कि भले ही अभी चार्जशीट दाखिल न हो, लेकिन जांच (Investigation) का आदेश अवश्य दिया जाना चाहिए ताकि दस्तावेजों की जालसाजी (Document Forgery) के पहलू की तह तक जाया जा सके।

कोर्ट ने मांगा जवाब: सोनिया और पुलिस को नोटिस जारी (Judicial Review)

विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने याचिकाकर्ता के वकील की दलीलें सुनने के बाद, मामले की गंभीरता को देखते हुए सोनिया गांधी और दिल्ली पुलिस दोनों को नोटिस (Judicial Review) जारी किया। कोर्ट ने दोनों पक्षों से जवाब दाखिल करने को कहा है। सोनिया गांधी को अब अदालत में यह स्पष्ट करना होगा कि नागरिकता मिलने से पहले उनका नाम वोटर लिस्ट में क्यों और कैसे दर्ज हुआ था, जबकि दिल्ली पुलिस को यह बताना होगा कि उन्होंने इस मामले में एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की। इस आपराधिक पुनर्विचार याचिका को स्वीकार करना एक महत्वपूर्ण कदम है जो इस जटिल कानूनी मामले को अगले चरण तक ले जाता है। कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 6 जनवरी 2026 तय की है, जिस दिन दोनों पक्षों के जवाबों के आधार पर अदालत यह तय करेगी कि क्या निचली अदालत का फैसला सही था या इस मामले में आगे की जांच की आवश्यकता है।

 

 

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