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Supreme Court: वकील को कड़ी फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा- न्यायपालिका को बदनाम न करें…

Supreme Court: शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में उस समय कड़ा रुख देखने को मिला, जब अदालत ने एक याचिका पर तीखी टिप्पणी करते हुए न सिर्फ याचिकाकर्ता को फटकार लगाई बल्कि एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। यह याचिका अल्पसंख्यक स्कूलों को शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) के प्रावधानों से छूट देने वाले सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि इस तरह की याचिकाओं के जरिए न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी (Supreme Court hearing)।

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किस याचिका पर भड़का सुप्रीम कोर्ट

यह मामला यूनाइटेड वॉयस फॉर एजुकेशन फोरम नामक एक एनजीओ द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। याचिका में दावा किया गया था कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को आरटीई एक्ट से दी गई छूट असंवैधानिक है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इससे इन संस्थानों को शिक्षा के अधिकार अधिनियम की जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त कर दिया गया है (RTE Act controversy)। इसी दलील को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया।

जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ की कड़ी टिप्पणी

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता और उसके वकील पर नाराजगी जताई। पीठ ने कहा कि अगर वकील इस तरह की सलाह दे रहे हैं, तो उन्हें भी दंडित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक सख्त संदेश देना जरूरी है ताकि इस तरह की निराधार याचिकाओं पर रोक लग सके (Judicial discipline)। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत इस तरह की याचिका दाखिल करना न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।

2014 के फैसले का हवाला देकर याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि वर्ष 2014 में दिए गए एक संवैधानिक पीठ के फैसले में यह साफ किया गया था कि अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यक संस्थानों पर आरटीई एक्ट लागू नहीं होता। इसके बावजूद उसी मुद्दे पर दोबारा याचिका दायर करना कोर्ट के समय की बर्बादी है। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया (Article 30 minority rights)।

‘म्यूचुअल फंड सही है’ याचिका पर भी सुनवाई से इनकार

इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य याचिका पर भी सुनवाई करने से इनकार कर दिया। यह याचिका ‘म्यूचुअल फंड सही है’ जैसे लोकप्रिय विज्ञापन अभियानों को लेकर दायर की गई थी। याचिका में दावा किया गया था कि ऐसे विज्ञापन निवेशकों को गुमराह करते हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस मामले को सुनने से साफ इनकार कर दिया (Mutual fund advertisement case)।

बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को दी गई अहमियत

दरअसल, यह याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दे रही थी, जिसमें हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। उस जनहित याचिका में एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) को निवेशक शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम चलाने के लिए दी गई छूट को रद्द करने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी (Investor awareness programs)।

भूकंप रोधी इमारतों की मांग वाली याचिका भी खारिज

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने देश में सभी इमारतों को भूकंप रोधी बनाने और भूकंप से निपटने के लिए समाधान की मांग करने वाली याचिका को भी खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि पहले माना जाता था कि दिल्ली सबसे अधिक भूकंप संभावित क्षेत्र है, लेकिन नई रिपोर्टों के अनुसार देश का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा भूकंप संभावित क्षेत्र में आता है (Earthquake safety India)।

जज की तीखी टिप्पणी ने खींचा ध्यान

इस दलील पर अदालत ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा, “तो क्या सभी लोगों को चांद पर रहने भेज दिया जाए?” याचिकाकर्ता ने जवाब में कहा कि वह भूकंप से होने वाले नुकसान को कम करने के उपायों की मांग लेकर कोर्ट आए हैं। उन्होंने कहा कि भवन निर्माण में भूकंप के खतरे को ध्यान में रखा जाना चाहिए (Disaster management policy)।

जापान के उदाहरण पर भी कोर्ट ने रोका

याचिकाकर्ता ने जापान में हाल ही में आए भूकंप का हवाला देते हुए वहां की भूकंप रोधी इमारतों पर चर्चा करने की कोशिश की। हालांकि, पीठ ने उन्हें वहीं रोक दिया। अदालत ने साफ कहा कि मीडिया में छपी रिपोर्टों के आधार पर कोर्ट में सुनवाई नहीं की जा सकती। कोर्ट के अनुसार यह विषय नीतिगत है और इसका समाधान सरकार और नीति निर्माताओं के स्तर पर होना चाहिए (Seismic building norms)।

नीतिगत मामलों में दखल से कोर्ट का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि हर सामाजिक या नीतिगत समस्या का समाधान न्यायालय से नहीं मांगा जा सकता। ऐसे मामलों में कार्यपालिका और विधायिका की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का काम नीति बनाना नहीं, बल्कि कानून की व्याख्या करना है (Judicial restraint principle)।

एक दिन, तीन याचिकाएं और सख्त संदेश

इन तीनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने यह साफ संदेश दिया कि निराधार, दोहराई गई या नीतिगत मामलों में दायर याचिकाओं को अदालत गंभीरता से नहीं लेगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी गरिमा और समय दोनों की रक्षा करना आवश्यक है। इस सख्त रुख से भविष्य में ऐसी याचिकाओं पर लगाम लगने की उम्मीद की जा रही है (Public interest litigation misuse)।

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