Leopard Attack – खाली होते पहाड़ी गांवों में बढ़ा तेंदुओं का खतरा
Leopard Attack – उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन का असर अब वन्यजीवों के व्यवहार में भी साफ दिखाई देने लगा है। राज्य के कई निर्जन हो चुके गांव तेंदुओं के लिए सुरक्षित ठिकानों में बदलते जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि खाली मकान, झाड़ियों से घिरे रास्ते और मानवीय गतिविधियों की कमी इन इलाकों को तेंदुओं के लिए अनुकूल बना रही है, जिससे आसपास के आबादी वाले गांवों में हमलों का जोखिम बढ़ रहा है।

वन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष जनवरी से मई के बीच तेंदुओं के हमलों में 14 लोगों की जान जा चुकी है। राज्य में सबसे अधिक निर्जन गांव पौड़ी जिले में हैं, जहां ऐसे गांवों की संख्या 189 बताई जाती है। इसी जिले में तेंदुओं के हमलों से सबसे अधिक मौतें भी दर्ज की गई हैं।
निर्जन गांव बन रहे वन्यजीवों के आश्रय स्थल
विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय से खाली पड़े गांवों में प्राकृतिक रूप से घनी वनस्पति विकसित हो जाती है। कई स्थानों पर मकान खंडहर बन चुके हैं और मानव गतिविधियां लगभग समाप्त हो गई हैं। ऐसे माहौल में तेंदुओं को छिपने, आराम करने और अपने शावकों को सुरक्षित रखने के लिए उपयुक्त जगह मिल जाती है।
वन्यजीव वैज्ञानिकों का मानना है कि इन क्षेत्रों में नियमित निगरानी और स्थानीय गतिविधियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, ताकि मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव को कम किया जा सके।
पांच महीनों में दर्ज हुए अनेक हमले
राज्य के विभिन्न पर्वतीय जिलों में इस वर्ष के शुरुआती पांच महीनों के दौरान तेंदुओं के हमलों की कई घटनाएं सामने आई हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 30 से अधिक लोग इन हमलों में घायल हुए हैं।
अल्मोड़ा जिला भी इस समस्या से गंभीर रूप से प्रभावित रहा है। यहां वर्ष 2026 में अब तक तेंदुओं के हमलों में तीन लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 15 से अधिक लोग घायल हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में शाम और सुबह के समय लोगों में भय का माहौल बना हुआ है।
आबादी के करीब रहना पसंद करता है तेंदुआ
वन अधिकारियों के अनुसार तेंदुआ स्वभाव से ऐसा वन्यजीव है जो अक्सर मानव बस्तियों के आसपास रहना पसंद करता है। गढ़वाल क्षेत्र के वन अधिकारियों का कहना है कि खाली गांवों में मौजूद झाड़ियां, परित्यक्त मकान और सुनसान वातावरण तेंदुओं को आकर्षित करते हैं।
कई बार ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं, जब निर्जन गांवों में मादा तेंदुआ अपने शावकों के साथ देखी गई। बाद में यही तेंदुए आसपास के आबादी वाले इलाकों में भोजन की तलाश में पहुंच जाते हैं। इससे ग्रामीणों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है।
पहाड़ों में अधिक गंभीर है स्थिति
वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है। वर्ष 2021 से 2025 के बीच उत्तराखंड के नौ पहाड़ी जिलों में वन्यजीव हमलों के कारण 94 लोगों की मौत हुई।
इसके विपरीत हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर, नैनीताल और देहरादून जैसे चार मैदानी जिलों में इसी अवधि के दौरान 25 लोगों की मौत दर्ज की गई। आंकड़े संकेत देते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में जोखिम का स्तर अपेक्षाकृत अधिक बना हुआ है।
25 वर्षों में तेजी से बढ़े हमलों के मामले
राज्य में वन्यजीव हमलों की घटनाओं में पिछले ढाई दशकों के दौरान उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2000 में वन्यजीव हमलों में घायल होने वाले लोगों की संख्या 56 थी। वहीं वर्ष 2025 तक यह आंकड़ा बढ़कर 557 तक पहुंच गया।
विशेषज्ञ इस बढ़ोतरी के पीछे आबादी और वन्यजीवों के बीच घटती दूरी, भूमि उपयोग में बदलाव और ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन को प्रमुख कारणों में शामिल करते हैं।
पौड़ी, अल्मोड़ा और टिहरी सबसे अधिक प्रभावित
पिछले चार वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पौड़ी जिला तेंदुओं के हमलों से सबसे अधिक प्रभावित रहा है। यहां 32 लोगों की जान गई और 140 लोग घायल हुए। अल्मोड़ा में 12 मौतें और 106 घायल, जबकि टिहरी गढ़वाल में 13 मौतें तथा 36 घायल दर्ज किए गए।
पिथौरागढ़, नैनीताल, ऊधम सिंह नगर, रुद्रप्रयाग, चंपावत, उत्तरकाशी, देहरादून, बागेश्वर और हरिद्वार में भी तेंदुओं के हमलों की घटनाएं सामने आई हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष उत्तराखंड के कई जिलों के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है, जिसके समाधान के लिए दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है।