झारखण्ड

JharkhandHighCourt – दो अहम मामलों में हाईकोर्ट के फैसलों ने स्पष्ट की कानूनी स्थिति

JharkhandHighCourt- झारखंड हाईकोर्ट ने अलग-अलग मामलों में दिए गए दो महत्वपूर्ण फैसलों के जरिए भारतीय कानून की व्याख्या को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। पहले मामले में अदालत ने कहा कि किसी महिला को विवाह का प्रस्ताव देना या सीमित समय तक उसके साथ रहना मात्र, बिना अश्लील आचरण या आपराधिक मंशा के, भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। वहीं दूसरे मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानसिक बीमारी का हवाला देकर पति, पत्नी के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।

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विवाह प्रस्ताव से जुड़े मामले में दोषसिद्धि रद्द

जस्टिस राजेश कुमार की एकल पीठ ने रामगढ़ जिले से जुड़े एक आपराधिक मामले में विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा सुनाए गए दोषसिद्धि और सजा के आदेश को निरस्त कर दिया। यह मामला वर्ष 2017 की एक घटना से संबंधित था, जिसमें एक नाबालिग के लापता होने के बाद आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 354 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 8 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को धारा 354 के तहत दोषी ठहराया था, जबकि पॉक्सो अधिनियम के आरोप से बरी कर दिया था। आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद मामले की दोबारा कानूनी समीक्षा की गई।

अदालत ने साक्ष्यों का किया विस्तृत परीक्षण

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयान और उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि आरोपी द्वारा विवाह का प्रस्ताव रखने और हाथ पकड़ने की बात सामने आई, लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी की मंशा महिला की गरिमा भंग करने या अश्लील हरकत करने की थी।

कोर्ट ने कहा कि धारा 354 लागू करने के लिए केवल घटना का उल्लेख पर्याप्त नहीं होता, बल्कि आरोपी की आपराधिक या अशोभनीय मंशा का स्पष्ट प्रमाण भी आवश्यक है। अदालत ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें इसी कानूनी सिद्धांत को दोहराया गया था। इसके आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि और सजा दोनों को रद्द कर दिया।

भरण-पोषण मामले में पति की याचिका खारिज

एक अन्य मामले में झारखंड हाईकोर्ट की जस्टिस आनंद चौधरी की पीठ ने अंतरिम भरण-पोषण से जुड़े विवाद पर फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि केवल मानसिक बीमारी का दावा करने से पति अपनी पत्नी के प्रति कानूनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानसिक बीमारी का अर्थ यह नहीं है कि वैवाहिक संबंध स्वतः समाप्त हो जाते हैं या पत्नी के अधिकार प्रभावित हो जाते हैं।

यह मामला फैमिली कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा था, जिसमें पति को अलग रह रही पत्नी को हर महीने 3,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। पति ने बाद में मानसिक बीमारी का हवाला देते हुए बकाया राशि के भुगतान से छूट की मांग की थी।

निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा

रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट के आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है। अदालत ने पति की याचिका खारिज करते हुए अंतरिम भरण-पोषण संबंधी आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने माना कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परिस्थितियां अपने आप में भरण-पोषण की जिम्मेदारी समाप्त करने का आधार नहीं बनतीं। दोनों फैसलों को कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इनमें आपराधिक मंशा और वैवाहिक दायित्वों से जुड़े सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

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