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Judiciary – कई हाईकोर्ट में स्थायी मुख्य न्यायाधीशों की कमी, नियुक्तियों पर बढ़ी चुनौती

Judiciary – देश के कई उच्च न्यायालय इस समय स्थायी मुख्य न्यायाधीश के बिना काम कर रहे हैं, जिससे न्यायिक प्रशासन को लेकर नई चुनौतियां सामने आ रही हैं। हाल के घटनाक्रम के बाद चार प्रमुख हाईकोर्ट में स्थायी मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो गया है। संविधान के अनुच्छेद 223 के अनुसार, जब किसी उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश का पद खाली होता है, तब राष्ट्रपति उस न्यायालय के लिए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते हैं ताकि न्यायिक और प्रशासनिक कार्य प्रभावित न हों।

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विभिन्न हाईकोर्ट में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी

फिलहाल बॉम्बे हाईकोर्ट में जस्टिस आर.वी. घुगे, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जस्टिस विवेक रूसिया और जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट में जस्टिस संजीव कुमार कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में दायित्व संभाल रहे हैं। वहीं पटना हाईकोर्ट में जस्टिस सुधीर सिंह, राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा तथा कलकत्ता हाईकोर्ट में जस्टिस तापब्रत चक्रवर्ती को भी कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

आने वाले महीनों में बढ़ सकती हैं रिक्तियां

न्यायपालिका के सामने यह स्थिति जल्द सामान्य होती नहीं दिख रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2026 के अंत तक कई और उच्च न्यायालयों के स्थायी मुख्य न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इनमें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रमेश सिन्हा 4 सितंबर 2026 को सेवानिवृत्त होंगे। राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा भी 26 सितंबर 2026 को रिटायर होंगे। इसके अलावा झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस एम.एस. सोनक, उड़ीसा हाईकोर्ट के जस्टिस हरीश टंडन और उत्तराखंड हाईकोर्ट के जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता भी वर्ष के अंत तक सेवा से निवृत्त होने वाले हैं।

कॉलेजियम की नई व्यवस्था पर बढ़ा दबाव

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने फरवरी 2026 में मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से एक नई एडवांस-ट्रांसफर पॉलिसी लागू की थी। इस व्यवस्था के तहत जिस न्यायाधीश को किसी हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया जाना होता है, उन्हें संबंधित पद खाली होने से लगभग दो महीने पहले ही उस न्यायालय में स्थानांतरित किया जाता है। इसका उद्देश्य प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखना और कार्यभार का सुचारू हस्तांतरण सुनिश्चित करना है। हालांकि, एक साथ कई रिक्तियां सामने आने के कारण इस नीति को प्रभावी ढंग से लागू करना कॉलेजियम के लिए चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में भी स्वीकृत संख्या से कम न्यायाधीश

उच्च न्यायालयों के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट में भी स्वीकृत क्षमता के मुकाबले न्यायाधीशों की संख्या कम है। वर्तमान में शीर्ष अदालत में 37 स्वीकृत पदों के मुकाबले 35 न्यायाधीश कार्यरत हैं। इसी वर्ष के अंत तक जस्टिस संजय करोल और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के सेवानिवृत्त होने की संभावना है, जिसके बाद रिक्त पदों की संख्या और बढ़ सकती है। ऐसे में उच्चतम न्यायालय और विभिन्न हाईकोर्ट में समय पर नियुक्तियां सुनिश्चित करना न्यायिक व्यवस्था की प्राथमिक आवश्यकता माना जा रहा है।

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