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Water Diversion – सिंधु बेसिन की नदियों पर भारत की नई परियोजनाओं की तैयारी जारी…

Water Diversion – सिंधु नदी प्रणाली से जुड़े जल संसाधनों के उपयोग को बढ़ाने के उद्देश्य से भारत सरकार ने दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ाने की तैयारी की है। इन योजनाओं का मकसद उन नदी जल संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग करना है, जिनका दोहन अब तक सीमित रहा है। परियोजनाओं के पूरा होने में कई वर्ष लग सकते हैं, लेकिन इन्हें भविष्य की जल प्रबंधन रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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हाल के वर्षों में जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और नदी बेसिनों के बीच समन्वय बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया है। इसी क्रम में नई सुरंग और जल मोड़ परियोजनाओं को लेकर विस्तृत योजना तैयार की जा रही है।

सिंधु जल व्यवस्था में बदलाव के बाद बढ़ी गतिविधियां

भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से लागू जल बंटवारे की व्यवस्था के तहत सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी प्रमुख नदियों का अधिकांश जल पाकिस्तान की ओर प्रवाहित होता रहा है, जबकि रावी, ब्यास और सतलुज के उपयोग पर भारत का प्रमुख अधिकार रहा है। हालिया परिस्थितियों के बाद भारत ने अपने हिस्से के जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर जोर देना शुरू किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्रशासनिक निर्णयों से पानी के प्रवाह को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके लिए बड़े स्तर पर बुनियादी ढांचे का निर्माण आवश्यक होता है, जिसमें बांध, बैराज, सुरंग और जल भंडारण सुविधाएं शामिल हैं।

चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना पर विशेष ध्यान

प्रस्तावित प्रमुख योजनाओं में चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस योजना के तहत लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण किया जाएगा, जिससे नदी के जल को एक बेसिन से दूसरे बेसिन तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।

परियोजना के शुरुआती चरण में लाहौल क्षेत्र में एक बैराज का निर्माण प्रस्तावित है। इसके माध्यम से चंद्रा नदी के जल को विशेष हाइड्रोलिक ढांचे और सुरंग प्रणाली की सहायता से ब्यास बेसिन की दिशा में मोड़ने की योजना है। अधिकारियों का मानना है कि इससे उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो सकेगा।

हजारों करोड़ रुपये की लागत का अनुमान

इस परियोजना पर लगभग 2,352 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया है। इसे एक दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखा जा रहा है, जिसका लाभ भविष्य में सिंचाई, ऊर्जा उत्पादन और जल प्रबंधन के क्षेत्र में मिल सकता है।

जल विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी परियोजनाएं केवल जल प्रवाह को प्रभावित नहीं करतीं बल्कि क्षेत्रीय विकास और ऊर्जा क्षमता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हालांकि इनके निर्माण में तकनीकी और पर्यावरणीय चुनौतियां भी सामने आती हैं, जिनका समाधान योजना के विभिन्न चरणों में किया जाता है।

सलाल परियोजना में गाद हटाने की योजना

दूसरी महत्वपूर्ण परियोजना जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में स्थित सलाल जलविद्युत परियोजना से जुड़ी है। यहां लंबे समय से गाद जमा होने की समस्या बनी हुई है, जिससे जलाशय की उपयोगी क्षमता में काफी कमी आई है।

स्थिति को सुधारने के लिए एक नया डायवर्जन-कम-सेडिमेंट बाईपास टनल बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इस परियोजना पर लगभग 268 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसका उद्देश्य जलाशय में जमा अवसाद को नियंत्रित करना और जल भंडारण क्षमता को बेहतर बनाना है।

दीर्घकालिक जल प्रबंधन की दिशा में कदम

विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों की नदियों में बड़ी मात्रा में मिट्टी और अवसाद बहकर आते हैं, जिससे समय के साथ जलाशयों की क्षमता प्रभावित होती है। ऐसे में आधुनिक बाईपास टनल और जल प्रबंधन प्रणालियां परियोजनाओं की उपयोगिता बनाए रखने में मदद करती हैं।

सरकारी एजेंसियों का मानना है कि दोनों परियोजनाएं भविष्य में जल संसाधनों के बेहतर उपयोग, ऊर्जा उत्पादन क्षमता में सुधार और नदी बेसिन प्रबंधन को मजबूत करने में सहायक होंगी। फिलहाल इन योजनाओं को तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर आगे बढ़ाने की प्रक्रिया जारी है।

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