HighCourt – वैवाहिक मामलों में ट्रांसफर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने की अहम टिप्पणी
HighCourt– इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों की सुनवाई के स्थानांतरण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि पत्नी की सुविधा या नाबालिग बच्चे के हित जैसे पहलू निश्चित रूप से विचारणीय हैं, लेकिन केवल इन्हीं आधारों पर किसी मामले को एक अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। न्यायालय के अनुसार, ट्रांसफर तभी उचित होगा जब यह स्पष्ट हो कि मौजूदा अदालत में सुनवाई जारी रहने से निष्पक्ष न्याय मिलने में वास्तविक बाधा उत्पन्न हो सकती है।

फैमिली कोर्ट ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने एक ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई के दौरान की। मामले में पत्नी ने अलीगढ़ फैमिली कोर्ट में लंबित हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत दायर दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापन संबंधी याचिका को गौतम बुद्ध नगर फैमिली कोर्ट स्थानांतरित करने की मांग की थी।
पत्नी और पति ने रखे अपने-अपने पक्ष
याचिकाकर्ता का कहना था कि वह अपनी नाबालिग बेटी के साथ गौतम बुद्ध नगर में रहती है। प्रत्येक सुनवाई के लिए अलीगढ़ आने-जाने में आर्थिक बोझ बढ़ता है और इससे बेटी की पढ़ाई भी प्रभावित होती है। उसने यह भी दलील दी कि भरण-पोषण से संबंधित एक अन्य मामला पहले से गौतम बुद्ध नगर की फैमिली कोर्ट में लंबित है, इसलिए दोनों मामलों की सुनवाई एक ही अदालत में होना व्यावहारिक रहेगा।
दूसरी ओर, पति ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि पत्नी का मायका और उसके रिश्तेदार अलीगढ़ में ही रहते हैं। उनके अनुसार, ट्रांसफर की मांग का उद्देश्य मुकदमे की सुनवाई को लंबा खींचना है।
न्याय के हित को बताया सबसे महत्वपूर्ण आधार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 24 के तहत मामलों के स्थानांतरण का अधिकार न्याय के हित में प्रयोग किया जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल दूरी, यात्रा की असुविधा या व्यक्तिगत सुविधा को ट्रांसफर का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। न्यायालय के अनुसार, यह साबित होना चाहिए कि यदि मामला स्थानांतरित नहीं किया गया तो निष्पक्ष सुनवाई या न्याय मिलने की संभावना प्रभावित होगी।
चरित्र प्रमाण पत्र पर भी अदालत की अहम टिप्पणी
एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित होने मात्र से उसका चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने का आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने कहा कि लंबित आपराधिक मामला अपने आप में चरित्र प्रमाण पत्र देने से इनकार करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
जालौन के मामले में सुनवाई
यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें जालौन के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा एक आवेदक का चरित्र प्रमाण पत्र आवेदन अस्वीकार कर दिया गया था। प्रशासन ने यह निर्णय इस आधार पर लिया था कि आवेदक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323, 504 और 506 के तहत मामला लंबित है। हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर कानून के सिद्धांतों के अनुरूप विचार करने की आवश्यकता पर जोर दिया।